पेरिस की गोद में जाकर बैठने से क्या दिल्ली, वाशिंगटन से मतभेद दूर कर पायेगी?



श्रीगंगानगर। भारतीय मतदाताओं को लुभाना दुनिया में सबसे आसान कार्य माना जाता है और भारतीय लोकतंत्र का उपहास चीन जैसा देश भी उड़ा चुका है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को नहीं मानता और दिल्ली की वर्तमान हालात को जंगलराज की संज्ञा दे चुका है। 

मतदाताओं को इसका कसूरवार नहीं माना जाना चाहिये, भारत सरकार की प्रेस अटैची जो किताब जारी करती है, पाठशालाएं वही मतदाताओं को परोसकर अपने पास ले जाती हैं। 

अब बात मुद्दों की जाये तो सामने आता है कि मास्को, वाशिंगटन जैसे परंपरागत मित्रों को छोडक़र दिल्ली, पेरिस और बर्लिन की गोद में जाकर क्यों बैठ गयी? सवाल बड़ा है?

पहली बार भारत में विदेशी सेना नियुक्त है? रूस ने तीन हजार सैनिकों को भारत में नियुक्त किया हुआ है और 10 फाइटर जेट तथा पांच युद्धपोत भारत की चारों दिशाओं में तैनात किया हैं। 

अगर मास्को ने दोस्त की हैसियत से यह सैनिक यहां तैनात किये हैं तो फिर तीन लाख करोड़ से बड़ा सौदा पेरिस के साथ क्यों हुआ, रूस के साथ क्यों नहीं?

यह विरोधाभासी स्थिति क्यों पैदा हुई? इसको समझने की आवश्यकता है और धीरज की आवश्यकता है। 


बर्लिन से दिल्ली पनडुब्बियां खरीद रही है जबकि यह क्षमता भारत सरकार के वैज्ञानिकों के पास भी है लेकिन जर्मन को खुश किया जाना था और किया जा रहा है। इसका लाभ यह हुआ कि यूरोपीय देश अमेरिका के खिलाफ एकजुट हो गये। 


यूरोपीय देश अमेरिका के खिलाफ हैं। अगले कुछ माह के भीतर  फ्रांस में नयी सरकार के गठन के लिए चुनाव होने हैं और उसके बाद क्या?


जून में पेरिस में जी-7 की बैठक का आयोजन होना है और भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आमंत्रित किया गया है। भारत इस समूह का सदस्य नहीं है। अमेरिका इस संगठन का संस्थापक और वरिष्ठ सदस्य है, किंतु उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड जे ट्रम्प इसमें भाग लेंगे या नहीं, कहा नहीं जा सकता। 


पेरिस और बर्लिन की गोद में बैठकर भी दिल्ली अपने मतभेदों को वाशिंगटन के साथ समाप्त नहीं कर सकी है। हालांकि दिल्ली के भीतर राजदूत के स्थान पर ट्रम्प ने दक्षिण, मध्य एशिया के विशेष दूत को नियुक्त किया है। इस तरह से सर्बियो गोर की सीधी अप्रोच वाशिंगटन में व्हाइट हाउस तक है। इसके बावजूद दोनों देश अपने मतभेदों को नहीं सुलझा सके हैं। 

अमेरिका ने एच 1 बी वीजा धारकों की संख्या को 65 हजार से कम कर 25 हजार कर दिया है और करीबन दो लाख डॉलर सालाना वेतन की सीमा भी तय किये जाने का प्रस्ताव किया गया है। इसका सीधा नुकसान भारतीय आईटी सैक्टर तथा उसके इंजीनियर्स को होगा जो अमेरिका जाकर बसने का ख्वाब देख रहे थे। 

इसके अतिरिक्त भी कई प्रकार के अन्य मतभेद हैं। फ्रांस, जर्मन  सहित यूरोपीय देश रूस से रक्षा के लिए स्वयं अमेरिका की मदद पर  निर्भर हैं। हजारों सैनिक इन देशों में तैनात हैं और अमेरिका की हवाई व अन्य बल भी तैनात हैं। 

एक तरफ यूरोप से मित्रता तो दूसरी ओर मास्को के सैनिकों को अपने देश में नियुक्त किया गया है, यह दिल्ली की विदेश नीति है। 

मास्को के पास यूरोप से ज्यादा बेहतर विमान हैं। सुपर सोनिक विमान देखते ही देखते आंखों से ओझल हो जाते हैं। अमेरिका के पास भी इसी तरह की सैन्य शक्ति है। 

जो पनडुब्बियां देश में बनायी जा सकती थी, उनकी खरीद की जा रही है, कारण एक ही है कि किसी तरह से यूरोप का साथ रहे और अमेरिका पर दबाव बनाया जा सके। 

अमेरिका ने यूरोपीय देशों से कार और ट्रक सहित अन्य वाहनों पर टैरिफ लगा दिया है। 

इस तरह से यूरोप से नौकरियां निकलकर अमेरिका जायेंगी और व्हाइट हाउस ने दावा किया है कि अप्रेल माह में ही 1.5 लाख नये जॉब क्रियेट किये गये हैं। पिछले सप्ताह ही एक ही दिन में स्टॉक मार्केट की वैल्यू एक ट्रिलियन डॉलर तक बढ़ गयी जो इतिहास में कभी नहीं हुआ था। 

अगर अब भी रूस के सैनिकों की भारत में नियुक्ति का राज समझ  नहीं आता तो इसका अर्थ यह होगा कि कहीं न कहीं आंखों पर जाला आया हुआ है और आंखों को इलाज की आवश्यकता है। 

Popular posts from this blog

ईरान परमाणु हथियारों पर समझौता करेगा, ट्रम्प इस्लामाबाद जायेंगे!

कमर्शियल गैस सिलेंडर की दरों में बदलाव किसी धमाके से कम नहीं

ट्रम्प से मुलाकात : सनाए ताकाईची आज व्हाइट हाउस में