डमरू तो भगवान शिव की पहचान है!
श्रीगंगानगर। ईरान का अर्थ आर्यों की भूमि। वहीं डमरू की बात करें तो यह भगवान शिव की पहचान है। जब हम उत्तराखण्ड के हरिद्वार जाते हैं, जहां मां गंगा का निवास है, उस गंगा के मध्य में भगवान शिव की महाप्रतिमा स्थापित है और उनके हाथ में डमरू और त्रिशूल है। जटाएं हैं।
उसी ईरान में जल डमरू मध्य स्थल है। यह स्थल अब ईरान की गुलामी का प्रतीक बन गया है क्योंकि ईरान इस मार्ग से किसी भी व्यवसायिक जहाज को नहीं निकलने दे रहा है।
इसकी आजादी के लिए अमेरिका ने अनेक मिसाइलों को दागा है। अब अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के जरिये ही यह संभव हो पायेगा, क्योंकि अमेरिका अकेला पूरी दुनिया की टेंशन को अपने कंधों पर लेने के लिए तैयार नहीं है।
अढ़ाई हजार साल पहले लिखे गये वेदों में महादेव की महिमा का गुणगान
भगवान शिव आदि देव हैं। इनकी उत्पत्ति का ज्ञान आज तक किसी को पता नहीं लग पाया है। लाखों सालों के ग्रंथ भी यह नहीं बता पाये हैं कि आदि देव का जन्म किस प्रकार हुआ।
सनातन धर्म के जानकार बताते हैं कि मां पार्वती और भगवान शंकर ही सृष्टि के जनक हैं और दुनिया में हर मनुष्य किसी न किसी उनकी संतान है। शिवलिंग को भगवान शिव और मां पार्वती के मिलन के प्रतीक के रूप में पूजित किया जाता है और यही सृष्टि के जन्म का सूचक है।
जल मध्य डमरू अर्थात जल के मध्य डमरू है
अब ईरान ने हिमाकत करते हुए 47 साल पहले ईरान की इस्लामी मिशनरी ने सारी प्रथाओं को समाप्त करते हुए वहां पर कब्जा कर लिया था। वहां पर अपनी सत्ता को जन्म दिया। 1949 की इस घटना को इस्लामी क्रांति का नाम दिया गया और अब इसकी आजादी की लड़ाई को अमेरिका व इजरायल ने आरंभ किया।
भगवान शिव ने ही दिया था खुद की खोज का वरदान
भगवान शिव स्वयं साधना करते हैं और उन्होंने मां पार्वती के माध्यम से दुनिया को स्वयं की खोज का मार्ग बताया था। ध्यान ही उन्होंने इसका उचित मार्ग बताया। साधना की इस कड़ी में अनेक संत हुए जिनमें पतांजली स्वामी भी शामिल हैं जिन्होंने साधना के जरिये इस संसार को अपनी खोई हुई पुरुषार्थ शक्ति को प्राप्त करने का मार्ग ध्यान ही बताया।
