नैतिकता कब विलुप्त हो गयी?
श्रीगंगानगर। जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री काल में लाल बहादुर शास्त्री ने रेल मंत्री के रूप में एक दुर्घटना के बाद नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद अनेक मौके आये जब मंत्रियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाया गया और इस्तीफा लिया गया। लालू प्रसाद यादव जेल गये तो उन्होंने जेल से सरकार नहीं चलायी बल्कि नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सत्ता सौंप दी। वहीं मौजूदा समय में नैतिकता कहीं खो गयी है। अरविंद केजरीवाल ने कई माह तक जेल से ही सरकार चलायी।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर पक्षपात का आरोप लगा और उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। नैतिकता तो यही कहती थी कि अपने ऊपर विश्वास खो जाने के बाद इस्तीफा ही एकमात्र उपाय बचता था, जिसको अपनाया जाता। हालांकि इस्तीफा देने के बाद भी नये पद मिलते रहे हैं लेकिन नैतिकता जीवित रहती रही थी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं सार्वजनिक रूप से कहते रहे हैं कि इमेज की किसको परवाह है?
यह बड़ा बयान है जिसको प्रचार तंत्र कोट नहीं करता।
इमेज की परवाह नहीं है तभी तो नीतिन गडकरी के पास 10 सालों से भी अधिक समय से एक ही मंत्रालय है। ओम बिरला सात सालों से लोकसभा अध्यक्ष हैं। इसी तरह अनेक अनेक अन्य बड़े चेहरे हैं जो एक टर्म पूरा करने के बाद दूसरे टर्म में भी वही पद संभाले हुए हैं।
कृषि मंत्रियों को किसानों के बीच नहीं देखा जाता। और भी बहुत से नैतिक कार्य देखे गये जहां नैतिकता नजर नहीं आयी।
सीबीआई पीएम के नजदीक लेकिन...?
केन्द्रीय जांच ब्यूरो प्रधानमंत्री के अधीन है लेकिन फिर भी ऐसे फैसले आ रहे हैं कि हर कोई हैरान है।
हाल ही में अरविंद केजरीवाल को सीबीआई की विशेष अदालत ने बरी कर दिया।
इसके बाद पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने बाबा राम रहीम को बरी कर दिया। सीबीआई की जांच को सही नहीं माना गया। मामला हत्या से संबंधित था। पत्रकार रामचंद्र छत्रपति का मर्डर हो गया था।
इससे पहले जयपुर बम ब्लास्ट के मामले में भी सीबीआई की जांच के बावजूद अदालत से आरोपी बरी हो गये थे।
यह बड़े मामले हैं जिनकी चर्चा होनी आवश्यक है लेकिन चर्चा नहीं हो रही। सीबीआई की विफलताओं के लिए कोई तो जिम्मेदार होगा?