भारत-अमेरिका के बीच कॉल्ड वॉर के बादल!
श्रीगंगानगर। भारत में विपक्षी दलों के दबाव के बीच सरकार ने जिस समझौते पर अमेरिका को सहमति दी थी, अब उस पर हस्ताक्षर नहीं हो रहे हैं। रॉयटर संवाद सेवा ने भी इस पर एक रिपोर्ट का प्रकाशन किया है।
अमेरिका ने अपने टैरिफ को भारत के खिलाफ इसलिए वापिस ले लिया था क्योंकि भारत ने एक ट्रेड डील को मान लिया था, जैसा की रिपोर्ट में बताया गया था।
50 प्रतिशत टैरिफ को 18 प्रतिशत कर दिया गया था और इसको भारत सरकार ने अपनी सफलता के रूप में प्रस्तुत किया था और भाजपाइयों ने जय-जय मोदी गुणवान के नारे लगाकर इस सफलता को भारत की सबसे बड़ी सफलता बताया था।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी देशों के टैरिफ को हटाया तो ट्रम्प प्रशासन ने तुरंत ही 15 प्रतिशत ग्लोबल टैक्स लगाकर किसी भी देश को राहत नहीं दी।
अब बताया जा रहा है कि भारत अमेरिका को जो निर्यात करता है, उसकी जांच की जा रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आज शुक्रवार 13 मार्च 2026 को दो कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर भी किये हैं और यह लेबलिंग से संबंधित हैं। इसका अर्थ यह है कि किसी दूसरे देश से निर्यात कर माल को मंगवाया जाता है और उस पर मेड इन यूएसए का लेबल लगा दिया जाता है।
अमेरिका अगर नये सिरे से कानूनसम्मत टैरिफ लगा देता है, क्योंकि अब कांग्रेस से विधेयक को पारित कर 16 देशों पर टैक्स लगाया जाना है तो इसका अर्थ साफ है कि भारत गणराज्य की सरकार के साथ टकराव बढ़ सकता है जो भारतीय अर्थव्यवस्था पहले ही हिचकोले खा रहे हैं। उसमें और परेशानी आ सकती है।
रूस भी पहले जैसा मित्रवत नहीं रहा
मास्को ने भारत को जनरेशन 6 के फाइटर जेट देने का अभी तक समझौता नहीं किया है और इसका अर्थ साफ है कि क्रेमलिन भारत पर दबाव बनाये हुए है कि वह देश में लोकतंत्र को मजबूत करे।
रूस के दबाव के चलते ही जीएसटी में भारी बदलाव हुआ क्योंकि मास्को ने 2014 से पहले की स्थिति को बनाये जाने का दबाव बनाया था। अभी भी टोल प्लाजा के नाम पर गहरी लूट चल रही है और उसको समाप्त करने के लिए सरकार प्रयास कर रही है, यह नजर नहीं आ रहा है।
