विश्व विदेश नीति का नया रूप ‘कार’ के रूप में दिखाई दे सकता है
श्रीगंगानगर। भारत सरकार ने हाल ही में अपने विदेशी मित्रो को प्रसन्न करने के लिए उनके साथ लाखों करोड़ के सैन्य समझौते किये हैं। फ्रांस से 140 फाइटर जेट खरीद किये जा रहे हैं तो जर्मन से पनडुब्बी खरीद का सौदा हुआ है। हालांकि पूर्व में मेड इन इंडिया का नारा जोश खरोश के साथ दिया गया था।
फ्रांस और जर्मन दोनों ने ही अमेरिका का साथ ईरान युद्ध में देने से इन्कार कर दिया तो इसके बाद नाटो का भविष्य अधरझूल में लटक गया। यूरोपीय देश और ब्रिटेन एकजुट हो गये और संयुक्त राज्य अमेरिका को अकेला छोडऩे का प्रयास किया गया।
अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चीन की यात्रा पर जा रहे हैं। यह उनकी दूसरी आसियान यात्रा है। इससे पहले वे जापान और दक्षिण कोरिया का प्रवास कर चुके हैं।
भारत में एक तरफ गैस-पेट्रोलियम पदार्थ की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। गैस को महंगा किया गया किंतु किल्लत इसके बाद भी दूर नहीं हो पायी। अब खाद्य तेल भी कम से कम 30 रुपये महंगा हो गया है।
दूसरी ओर कम्प्यूटर पार्ट्र्स की भी किल्लत हो रखी है और जमकर इसकी भी कालाबाजारी हो रखी है। यह आम व्यक्ति की जरूरत बन चुकी है किंतु इसके बावजूद अभी तक इसको तवज्जो नहीं दी जा रही है।
चीन यात्रा से पहले रूस से पेट्रोलियम पदार्थ के प्रतिबंध को हटा लिया है। अन्य प्रतिबंध भी चीन की यात्रा के बाद हटने की पूरी संभावना है क्योंकि एक नयी विदेश नीति बनने जा रही है।
अगर अमेरिका से मिल रहे संकेतों को देखें तो माना जा सकता है कि अमेरिका, रूस और चाइना एकजुट हो सकते हैं। चाइना और अमेरिका के बीच पहले भी वार्ता हो चुकी है। रूस के साथ फोन पर वार्ता हाल ही हुई है। ब्लादीमिर पुतिन भी ट्रम्प के आमंत्रण पर अमेरिका की यात्रा भी कर चुके हैं।
क्या अगली बार ट्रम्प रूस की यात्रा पर जा सकते हैं। चाइना, अमेरिका और रूस अगर मिल जाते हैं तो यह ‘कार’ का रूप ले लेगा जो सरपट दौड़ती है। इसकी जानकारी अन्य देशों की एजेंसियों को भी हैं। यूरोप अब अलग-थलग पड़ सकता है। रूस से पहले सस्ता तेल और गैस खरीदकर उसको यूरोपीय देशों को महंगे दामों पर बेचा गया और अब मास्को का कहना है कि यूरोप को रूसी गैस और तेल नहीं मिले, यह सुनिश्चित किया जायेगा। इसके लिए काम चल रहा है।
वेनेजुएला पर भी अमेरिका की नीति का संचालन हो रहा है तो इस तरह से यूरोप पूरी तरह से पश्चिमी देशों पर निर्भर हो जायेंगे, जहां पर युद्ध चल रहा है। अमेरिका की विदेश नीति का असर दक्षेस से ज्यादा यूरोप पर नजर आ रहा है।
