भारतीय रुपया शतक के और करीब पहुंचा
श्रीगंगानगर। पश्चिम एशिया में युद्ध के और भडक़ जाने से इसका सीधा असर भारतीय रुपया पर भी पड़ रहा है और शनिवार प्रात: इसके दाम 94.05 प्रति डॉलर हो गये। शतक से मात्र 6 रुपये की दूरी है।
संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने एक बयान में कहा है कि उनका उद्देश्य जीत है और सम्पूर्ण जीत। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की आतंकवाद विचारधारा वाली शासन व्यवस्था को हमारी महान मिल्ट्री उखाड़ फेंकने में कामयाब हो रही है। वहीं तेहरान ने ब्रिटेन को चेतावनी दी है कि वह अपने सैन्य अड्डे यूएसए को नहीं दे, अन्यथा इसे एक्ट ऑफ वॉर माना जायेगा।
रायटर संवाद सेवा ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि ब्रिटेन सरकार अब अपनी विचारधारा में परिवर्तन ला रही है और अमेरिका की सेना और उसके ठिकानों को लक्षित करने वाले हमलों को रोकने में यूएसए की मदद करेगी।
व्यापार घाटा और चुनाव!
केरल, तमिलनाडू, पश्चिम बंगाल और आसाम आदि राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत इजाफा हो चुका है। इसके पश्चात भी सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि नहीं की है। प्रीमियम पेट्रोल दो रुपये बढ़ाया गया है जबकि जो डीजल औद्योगिक क्षेत्र इस्तेमाल करता है, उसमें 22 रुपये की बढ़ोतरी की गयी है।
पेट्रोलियम पदार्थों का सरकार घाटा बर्दाश्त कर रही है तो इसका कारण यह भी है कि महत्वपूर्ण राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव है और सरकार यह प्रदर्शित करना चाहती है कि कच्चे तेल की वृद्धि को शासन व्यवस्था संभाल सकती है।
जबकि सरकार की पौल रुपये ने खोल दी। जो रुपया कल तक 93 रुपये के आसपास था, वह एक ही दिन में 94 रुपये पर पहुंच गया है। शनिवार सुबह तक भारतीय मुद्रा यूएसडी के मुकाबले 94.05 अपनी कीमत दर्शा रही थी।
रुपये की कमजोर स्थिति व्यापार घाटा को बढ़ायेगी। सरकार के सामने हालात यह हो गये हैं कि वह न तो ब्याज दरों को कम कर सकती है और न ही बढ़ा सकती है। वह केवल देख सकती है। ब्याज दरों को बढ़ाया जाता है तो इससे महंगाई कंट्रोल में होगी लेकिन बाजार से तरलता और कम हो जायेगी। रिजर्व बैंक ने हाल ही में तरलता की पूर्ति के लिए 50 हजार करोड़ रुपये सीधे बाजार के लिए जारी किये हैं।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी से परचेज पॉवर कमजोर हो जायेगी और अर्थव्यवस्था सुस्ती की ओर बढ़ जायेगी। दूसरी ओर यूएसए ने अभी तक ट्रेड डील नहीं होने के कारण ग्लोबल टैक्स को कम नहीं किया है और इससे निर्यात व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है।
सरकार एक तरफ चारों ओर से घिर चुकी है। आर्थिक मोर्चेबंदी से बाहर निकलने के लिए सरकार के पास फिलहाल कोई मार्ग नहीं है और तेल व गैस की आपूर्ति बनाये रखने के लिए विदेश मंत्री को संबंधित देशों से सम्पर्क बनाये रखने के लिए कहा गया है किंतु जो ईरान की मिसाइलों ने उत्पादन संयंत्रों को नष्ट कर दिया है या नुकसान पहुंचा दिया है, वहां से आपूर्ति किस प्रकार हो पायेगी और कितने दिन की जा सकेगी।
अब रस्ता सिर्फ वाशिंगटन की ओर जाता है
प्राकृतिक गैस, पेट्रोल के लिए पश्चिम एशिया के अतिरिक्त अब रूस और अमेरिका दो देश नजर आ रहे हैं। रूस कितने देशों को निर्यात कर पायेगा। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है, वहां से परिवहन पर ही भारी खर्च होगा। दूसरी ओर अमेरिका प्रशासन बिना ट्रेड डील के तेल देगा, यह भी विचारणीय है।
खाद्य पदार्थों और खाद का भी होता है आयात
भारत अकेले कच्चे तेल ही नहीं अपितु इस्पात, खाद्य पदार्थ और खाद का भी आयात करता है। अब डॉलर महंगा होता जा रहा है और रुपया कमजोर होता जा रहा है तो इससे व्यापार घाटा की पूर्ति करने के लिए सरकार को अतिरिक्त नोट छापने होंगे। इससे महंगाई और बढ़ेगी। महंगाई ऐसा नासूर है कि एक बार बढ़ जाये तो कितना भी इलाज कीजिये, यह ठीक नहीं होती। एक बार जो दाम फिक्स हो गये, उसको कम करना आसान नहीं है।
दूसरी ओर विधानसभा चुनाव का प्रचार थमा तो दूसरी ही दिन पेट्रोलियम पदार्थों के बढ़ते दामों का बम आम जनता पर ही फोड़ा जायेगा।
रिजर्व सोना बेचना पड़ सकता है
ब्रिक्स देश जिसमें ब्राजिल, चीन, भारत आदि शामिल हैं, ने सीधे अमेरिकी मुद्रा को चुनौति देने के लिए डॉलर के स्थान पर सोना की खरीद की थी और सोने के भाव एक साल के भीतर ही 60 हजार से 1 लाख 60 हजार रुपये या इससे भी ज्यादा पहुंच गये थे। सोने के दामों में बढ़ोतरी हुई तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर के पार पहुंच गया। इसको सरकार अपनी उपलब्धी बता रही थी। अब तेल और अन्य सामान खरीद के लिए सरकार को बाजार में सोना बेचना होगा और यह एक देश की समस्या नहीं बल्कि ब्रिक्स के सभी देशों की समस्या है। बाजार में सोना आयेगा तो दाम जिस गति से बढ़े थे, उसी गति से गिरेंगे भी। चौबे जी चले थे... वाली कहावत सच साबित हो जायेगी।
