‘खालसा’ को बदनाम करने की सरकारी साजिश तो नहीं थी?





किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं है बल्कि सरकार की नीतियों की एक समीक्षा व्यवस्था की गयी है। 


वर्ष 1971 में पंजाब को ज्यादा आजादी दिये जाने की वकालत करते हुए आनंदपुर साहिब में प्रस्ताव पारित किया गया। 70 के दशक में ही खालिस्तान आतंकवाद का शब्द पेश किया गया।

एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी कहते हैं कि उनको कनाडा भेजा गया, भारत का राजदूत बनाकर जो वहां पर खालिस्तानी गतिविधियों पर नजर रखे। उनका कहना है कि 1970 के दशक में ओटावा में इस तरह का माहौल ही नहीं था कि खालिस्तान या आतंकवाद शब्द को पिरोकर रिपोर्ट पेश की जाये। 

गुरु ग्रंथ साहिब में शब्द है, राज करेगा खालसा, आकी रहे न कोय। अर्थात जब खालसा अर्थात पवित्र व्यक्ति राज करेगा तो दिल्ली से तो कहीं भी कोई दुखी  नहीं होगा। 

इस एक वाणी को बदनाम किया गया। सरकारी तंत्र ने ही कुछ ऐसे लोगों को आगे किया और इसके बाद खालिस्तान शब्द ही बदनाम हो गया। इस नाम को भारत गणराज्य की सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। 

आनंदपुर प्रस्ताव में सरकार को पंच तत्व पर कब्जा करने का प्रस्ताव दिया गया था अर्थात पांच विभाग केन्द्र सरकार के पास रहेंगे जिनमें विदेश, संचार, सुरक्षा, रेल आदि शामिल थे और चण्डीगढ़ राज्य को वापिस पंजाब में शामिल किये जाने की वकालत की गयी थी। इसके अतिरिक्त श्रीगंगानगर जिला भी पंजाब का ही हिस्सा मना गया और इसको राजस्थान के कुछ हिस्से के रूप में वर्गीकृत किया गया। 

खालिस्तान टाइगर फोर्स, बब्बर खालसा जैसे संगठन पाकिस्तान से संचालित किये गये। 

नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कुछ संगठनों से प्रतिबंधों को हटाया किंतु पंजाब राज्य में सरकार नहीं बन पायी तो प्रतिबंधों को टाइट कर दिय गया। 

अब जस्ट्सि फॉर सिख भी प्रतिबंधित हो चुका है। यह एक गैर हिंसक आंदोलन है और इसमें बंदी सिखों की रिहाई के लिए वकालत की मांग की गयी है और अभिव्यक्ति का अधिकार के तहत उनको यह मांग उठाने का अधिकार था। 

खैर सरकार ने 1970 से लेकर 2020 तक जो कुछ भी 50 सालों के भीतर किया है, उससे एक बात साफ हो गयी है कि सरकारों ने सिखों के लिए एक द्वेष भावना पैदा करने की असफल कोशिश की है किंतु पंजाबने अमन, शांति का रास्ता अपनाकर दोनों धर्म के लोगों के शांति से रहने के कारण इन सरकारी कार्यों को असफल कर दिया। 

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