अमेरिका : रूस का तेल से भरा टैंकर जब्त

 


श्रीगंगानगर। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार पुन: दुनिया को अचंभित कर दिया, जब उनकी सेना ने रूस के एक टैंकर को बीच समुन्द्र कब्जे में ले लिया। एक सबमरीन समुन्द्री सीमा में थी, किंतु वह मदद के लिए नहीं पहुंच पायी। इस तेल टैंकर की तलाश समुन्द्र में अमेरिकी अधिकारी कई दिन से कर रहे थे क्योंकि वेनेजुएला से यह टैंकर तेल लेकर रवाना हुआ था, जब अमेरिका ने प्रतिबंध का एलान करते हुए पूरे इलाके को घेरा हुआ था। 

वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उनके सरकारी निवास से रातों-रात अपने कब्जे में लेने के बाद विश्व की दूसरी महाशक्ति रूस के तेल टैंकर को अपने कब्जे में लेना, एक ‘परमाणु विस्फोट’ के समान माना जा सकता है। इससे कोल्ड वॉर टाइम की यादें फिर से ताजा हो गयीं और माना जा रहा है कि दूसरा दौर अब आरंभ होने वाला है। 


रूस ने अमेरिका को चेतावनी जारी की 

मास्को  ने एक चेतावनी भरा संदेश जारी किया है। संसद के एक अधिकारी ने कहा, रूसी टैंकर को जब्त किये जाने के बाद अमेरिका पर स्ट्राइक की जानी चाहिये। हालांकि मार्क रूबियो जो विदेश मंत्री, अमेरिका सरकार के हैं, ने चीन-रूस दोनों को चेतावनी दी है कि वह ताकत को अपना हथियार नहीं बनाएं। 


आज आर्थिक सुधारों का एक बड़ा आदेश जारी कर सकते हैं ट्रम्प

आपको याद होगा कि 7 नवंबर 2016 की रात भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी का एलान कर दिया था और 1 हजार व 500 के नोट को ईलीगल घोषित कर दिया था। इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर रहा। हालांकि इसके बाद भी भारत में भ्रष्टाचार, समानांतर प्रशासन आदि कुनीतियां जारी रहीं। 

वहीं इसके विपरीत डोनाल्ड ट्रम्प आज गुरुवार को आर्थिक सुधारों का एक बड़ा एलान कर सकते हैं। यह आज अमेरिकी समयानुसार  शाम पांच बजे हो सकता है हालांकि अधिकारिक समय जारी नहीं किया गया है। 


चाइना से युद्ध की तैयारियां, दर्जनों युद्धपोत प्रशांत महासागर पहुंचे

उधर अमेरिका ने आने वाले दिनों में चीन से संभावित युद्ध की आशंका को ध्यान में रखते हुए संसद से 1.5 ट्रिलियन डॉलर का बजट अगले वित्तीय वर्ष में दिये जाने का प्रस्ताव किया है। यह 50 प्रतिशत बढ़ोतरी होगी जबकि यूरोपीय देश अभी 5 प्रतिशत बढ़ोतरी पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं। 

अमेरिका इस बार अभी यूरोपीय देशों के नाटो या जी-7 देशों से सहयोग पर चर्चा नहीं कर रहा है। एक अमेरिकी थिंक टैंक का मानना है, लगता है इस बार अमेरिका अकेला ही लडऩा चाहता है क्योंकि यूरोपीय देशों की विचारधारा में काफी अंतर है और वे लोग एकमत नहीं हो पा रहे हैं। वेनेजुएला में कार्यवाही में अमेरिका अकेला ही शामिल था। 

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