मन की बात : मोदी अपने ही जाल में कैसे फंस गये?
सतीश बेरी
श्रीगंगानगर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चतुर और समझदार नेता माना जाता है, लेकिन क्या ये सच में वैसा ही है जैसा हमें दिखाया और पढ़ाया जा रहा है? इस सच को जानने के लिए कुछ साल पीछे चलना होगा।
वर्ष 2018 में हमला हुआ। एक बड़ी साजिश के तहत रॉ कार्यालय के पीछे हाथ-पैर तोड़ दिये गये। सभी 20 नाखून को तोड़ दिया गया। कई पसलियां टूट गयीं। हमले के समय पुलिस अधीक्षक के पद पर दलित पुलिस अधीक्षक हरेन्द्र महावर थे। वारदात के कुछ दिनों बाद ही पीएम ने दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित करवाया और तत्कालीन टेलीकॉम मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद से उनको सम्मानित करवाया। जबकि उनकी कोई ऐसी उपलब्धि नहीं थी, जिससे श्रीगंगानगर का मान-सम्मान बढ़ा हो।
अनेक पुलिस अधिकारी 2010 के आसपास डैडबॉडी बेचने का धंधा करते थे, उनका खुलासा किया तो इसके बाद महकमे के अनेक अधिकारी दुश्मन हो गये और वे दुश्मनी का धर्म अभी भी निभा रहे हैं। 2018 में भी निभाया।
वर्ष 1 मई 2018 की घटना के बाद ऐसा कुछ दिखाई नहीं दिया जिससे लगता हो कि एक पत्रकार पर हमला किया गया हो। खैर पीएम को अनेक बार पत्र लिखे और वे पत्र नरेन्द्र मोदी अपने विदेश मंत्रालय के माध्यम से अमेरिका भिजवा देते। इसकी जानकारी लिखित में मुझे दे दी जाती।
जब अमेरिका को जानकारी भेजने की बात आयी तो उसके बाद मैंने सीधा व्यवहार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से किया। उनको पत्र लिखे। खैर इसके बाद कार्यवाही आरंभ हो गयी और जिलास्तरीय पत्रकार सतीश बेरी एक वीआईपी की तरह से ट्रीट किया जाने लगा।
उस समय मुझे आज की तरह अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जानकारी 1 प्रतिशत भी नहीं थी। इवांका ट्रम्प ने मुझे प्रशिक्षित किया और एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की सोच विकसित की। 2020 तक सबकुछ बढिय़ा चल रहा था और राष्ट्रपति ट्रम्प को वहां हुए आम चुनाव में पराजित घोषित किया गया तो अमेरिका में सत्ता बदल गयी।
फिर से सतीश बेरी को एक साधारण आदमी बनाया गया और कई तरह की उलझण में बिजी कर दिया। वक्त का इंतजार खत्म हुआ और 2024 के चुनावों में ट्रम्प की वापसी हो गयी, जिसकी पहले से ही आशा थी।
इस तरह से अब ट्रम्प आये तो वे पिछले चार साल को देख चुके थे कि किस तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी नीतियां बदल ली थीं।
ट्रम्प साहब भी अब पूरी तरह से बदल गये और उन्होंने विदेश नीति को नया रूप आरंभ कर दिया। चार साल में वे अमेरिका जाने के बाद एक बार भी ट्रम्प से नहीं मिले थे। मित्रता को भूल चुके थे।
नयी विदेश नीति में ‘अमेरिका फस्र्ट’ के साथ दक्षिण व मध्य एशिया के लिए भी उन्होंने नये प्लान तैयार किये।
आज विदेश मंत्री एस जयशंकर कह रहे हैं, ‘भारत को अलग-थलग करने के लिए नीतियां बनायी जा रही हैं।’ असल में भारत नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी की कारगुजारियों को नियंत्रित करने के लिए नयी नीतियां बनायी गयी। जो वक्त पर तुरंत अपना वक्तव्य, अपनी नीतियां बदल लेते हैं।
अगर प्रधानमंत्री 2018 में अपने धर्म का पालन करते और अमेरिका को पत्र नहीं लिखते तो आज संभवत: भारत 56 का गौरव देख पाता। अब पीएम अपने ही जाल में फंस गये हैं।
वे कहते हैं कि हमारी अपनी नीतियां हैं। हमारी अपनी विदेश नीति है और दबाव नहीं है।
अगर यह सबकुछ होता तो निश्चित रूप से खुशी होती।
जब डोनाल्ड ट्रम्प पहले कार्यकाल के लिए व्हाइट हाउस में थे तो उस समय भी एयर स्ट्राइक की गयी थी। भारत सरकार के एक वायु सैनिक अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया था। उस समय ट्रम्प सिंगापुर में थे। उन्होंने कहा था, भारत को कुछ देर में अच्छी न्यूज मिलेगी और मिली भी। भारतीय अधिकारी को रिहा कर दिया गया और वे विदेश आ गये।
सिंगापुर में उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के साथ वे बैठक कर रहे थे और ट्रम्प ने वहीं से ही भारतीय अधिकारी को पाक की जेल से बाहर निकालकर वापस भारत भिजवा दिया। इसी तरह से ऑपरेशन सिंदूर के लिए भी युद्ध विराम की घोषणा ट्वीटर के जरिये पहले अमेरिका से आयी थी, जिसको बाद में भारत सरकार ने स्वीकार किया।
अब एक बार फिर से पत्रकार सतीश बेरी के जीवन, आजादी और प्रतिष्ठा को खतरा उत्पन्न हे तो उस समय भी अमेरिका से ही सूचनाएं भारत सरकार तक भिजवायी जा रही हैं।
अब विश्वगुरु अच्छे निर्णय ले रहे हैं या नहीं यह देश की जनता ने तय करना है।
