यूरोप में क्यों नहीं मनाया जा रहा क्रिसमिस, ऑस्ट्रेलियाई पीएम का विरोध क्यों हुआ? रेड फोर्ट पर हमले पर चुप्पी क्यों?
श्रीगंगानगर। क्रिसमिस का पर्व अब चार दिनों की दूरी पर है किंतु यूरोप और ऑस्ट्रेलिया इस त्योहार को सरकारी तौर पर नहीं मना रहा है। सभी कार्यक्रम रद्द किये जा रहे हैं। वहीं कंगारू पीएम को अपने ही देश में विरोध का सामना करना पड़ा। वे बांडी बीच के पीडि़तों के लिए आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने के लिए पहुंचे थे। दूसरी ओर भारत सरकार की आर्थिक नीतियों पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं।
पश्चिमी देशों में क्रिसमिस का पर्व 25 दिसंबर को हर साल मनाया जाता है। इन देशों में सरकारें अपने देश के लोगों के लिए सरकारी स्तर पर भी कार्यक्रम आयोजित करती हैं। सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन सहित अवकाश भी घोषित करती हैं। इस तरह से दुनिया भर में 250 करोड़ या इससे भी अधिक लोग पर्व को उल्लास के साथ मनाते हैं। सांता क्लॉज के लिए भारत में भी स्कूली बच्चों का चयन किया जाता है। वैश्विक स्तर पर सभी धर्मों का आदर करने के लिए यह कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।
ऑस्ट्रेलिया, जर्मन और फ्रांस ने अपने स्टेट में सरकारी कार्यक्रमों को निरस्त कर दिया है। यह संभवत: पहला मौका है जब इस तरह का निर्णय लिया गया है। यूरोप के अन्य देशों में इस तरह के निर्णय लेने पर विचार किया जा रहा है।
पश्चिमी राज्यों में इस समय ‘मानवाधिकार और किसान’ समर्थक कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया में यहूदी लोगों पर गोलियां बरसाकर की गयी जघन्य हत्याओं के लिए भी लोगों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। इस आतंकवादी हमले में 12 लोगों की मौत होने की जानकारी मीडिया रिपोर्ट में दी गयी थी।
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी एल्बोनीज आज रविवार को ऑस्ट्रेलिया की बॉण्डी बीच पर हुए आतंकवादी हमलास्थल पर शोक व्यक्त करने के लिए गये थे कि वहां पर मौजूद भीड़ में प्रधानमंत्री के खिलाफ नारेबाजी की। वहीं विपक्षी नेता के समर्थन में नारे लगाये गये। विपक्षी नेता का कहना था कि अगर वे सत्ता में आते हैं तो निश्चित रूप से दो राज्यों के आदेश को पलट देंगे।
यूरोप के अनेक देशों में मानवाधिकार और किसान समर्थक आंदोलन हो रहे हैं। हजारों नहीं बल्कि लाखों या इससे भी कहीं ज्यादा लोग सडक़ों पर आकर प्रदर्शन कर रहे हैं।
पूरी दुनिया में एक आवाज सुनाई दे रही है। अगर भारत की चर्चा की जाये तो यहां पर भी पंजाबी लोग आंदोलन कर रहे हैं। इनमें अधिकांश या यूं कहें कि 90 प्रतिशत पगड़ीधारी आंदोलन में शामिल हैं।
सहजधारी देश भर में इससे अलग हैं। दुनिया में सिखों ने जस्ट्सि फॉर सिख, बंदी छोड़ो आंदोलन किये हैं, लेकिन हिन्दू वर्ग में उस तरह का उत्साह नहीं देखा गया।
लाल किले पर हमले पर चुप्पी क्यों?
लाल किले पर 10 नवंबर को हुए आतंकवादी हमले में पाकिस्तान की भूमिका को जांच एजेंसी एनआईए और सरकार ने स्वीकार किया था। इससे पहले उड़ी, पहलगाम और पुलवामा में हुए आतंकवादियों के हमले उपरांत सरकार ने जीरो टॉलरेंस का नारा देते हुए पाकिस्तान पर स्ट्राइक करने का दावा किया था।
लाल किले पर हमले को 40 दिन से ज्यादा हो गये हैं। 12 लोगों की मौत हो गयी थी और इस प्रकरण में एनआईए ने अनेक आतंकवादियों और एक मेडिकल कॉलेज के डीन को गिरफ्तार किया था।
सरकार का कहना था उचित समय पर उचित कार्यवाही होगी। लाल किले पर पूर्व में भी हमले होते रहे हैं। एक बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने सीमा के पास सेना को नियुक्त किया था। इस बार माहौल बदला हुआ है क्योंकि पाकिस्तान ने सउदी अरब के साथ नाटो जैसा समझौता किया हुआ है। इस कारण सरकार ने आतंकवाद का आरोप लगाते हुए इन दिनों एक बार भी सर्जिकल स्ट्राइक आदि के बारे में जानकारी नहीं दी।
क्या सरकार सउदी अरब के भय से पाकिस्तान के खिलाफ बोलने से बच रही है। सवाल बड़ा है लेकिन इसका उत्तर कभी नहीं मिल पायेगा। हालांकि रूस की सेना को भारत में स्थापित कर दिया गया है। यह क्या माजरा है, यह भी किसी आम आदमी की समझ में नहीं आया। भारत की सेना दुनिया में टॉप 5 में है फिर इस तरह का निर्णय क्यों लिया गया।
दूसरी ओर अफगानिस्तान को चेतावनी दी है कि वह पीटीपी का साथ नहीं दे। उसे पीटीपी या पाकिस्तान में से एक का चुनाव करना होगा। हालांकि अफगानिस्तान में जो लोग काम करने के लिए पाकिस्तान जाते हैं वह पाक की रट लगाये हुए हैं।
