फाइटर जेट : यही समय है, सही समय है!
श्रीगंगानगर। भारत गणराज्य की सरकार कोशिशों के बावजूद अभी तक अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सफल रहे हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता है। क्रय-शक्ति कमजोर होने और सरकारी नियंत्रण कमजोर होने के कारण जीडीपी के साथ-साथ रुपया भी कमजोर होता हुआ शतक की ओर कदम बढ़ा रहा है।
भारत सरकार मंत्रों वाली सरकार है। आपदा में अवसर और न जाने कितने मंत्र दिये गये हैं किंतु इससे समाज में बदलाव आता दिखाई दिया हो, यह नहीं दिख रहा।
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का मंत्र भी मौजूदा गणराज्य की सरकार की ओर से दिया गया था। इसके बाद भी देखते हैं कि दहेज हत्याओं के मामलों में कोई कमी नहीं आयी।
मोदी सरकार ने महिला सुरक्षा के नाम पर शरिया कानून के अनुसार तीन तलाक की प्रथा को समाप्त करने के लिए कानून बना दिया, इससे सरकार को राजनीतिक लाभ हुआ। किंतु हिन्दू विवाह अधिनियम में दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए कोई सामाजिक या कानूनी अधिकार बदलाव नहीं किया गया।
अगर सरकार के आकड़ों पर ही गौर करें तो हर साल 6 हजार से अधिक मामले दहेज हत्या के रूप में दर्ज किये जाते हैं। यह आकड़े के साथ-साथ एक और जानकारी भी दिल दहला देने वाली है।
एक सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर के अनुसार उनको जो प्रशिक्षण दिया जाता है, उसमें यह तय किया जाता है कि किस धारा में कितने मामलों को रोका जाना चाहिये। पुलिस थानों में एफआईआर न होना और उसका शोर मचाया जाना अनेक बार सामने आता है किंतु थानाधिकारी पर दबाव होता है कि वह आईपीसी के मुकदमों को सीमित रखे। वहीं एक्ट की कार्यवाही को हर साल कम से कम 10 प्रतिशत बढ़ाये।
एक्ट का यहां अर्थ हो जाता है आबकारी अधिनियम, आम्र्स एक्ट, एनडीपीएस एक्ट आदि-आदि। आईपीसी के मुकदमों को कम दर्ज करना और इसको एक उपलब्धि के रूप में जनता के सामने पेश करना एक जरिया रहा है वाहवाही लूटने का।
भारत सरकार के आकड़े यह भी बताते हैं कि हर वर्ष करीबन 30 हजार रेप के मुकदमे दर्ज किये जाते हैं। 2022 में यह संख्या 31516 मामले दर्ज हुए। 2023 में 29670 मामले दर्ज हुए।
यहां यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश है कि अगर बलात्कार का मुकदमा दर्ज करने से थानाधिकारी इंकार कर दे तो उसको भी अभियुक्त माना जाये। इसके बाद भी यह संख्या 30 हजार के आसपास आकर रूक जाती है।
अगर हम गंगानगर की बात करें तो हर साल यहां पर 10 हजार मुकदमे दर्ज होते हैं। सभी प्रकार के मामलों में। 9 हजार के आसपास आकर सरकारी मशीनरी रूक जाती है।
श्रीगंगानगर में हत्याओं के मुकदमे प्रत्येक वर्ष 30 से 35 दर्ज किये जाते हैं। इसको 50 से भी कम माना जाता है। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि किस प्रकार अपराध पर नियंत्रण रखा जाता है। हत्या के मामले आत्महत्या में भी बदल दिये जाते हैं।
हिन्दू विवाह में दहेज क्यों?
हिन्दू विवाह अधिनियम अंग्रेजी शासनकाल में बनाया गया था और इसमें बदलाव नहीं हुआ। इंकम टैक्स, जीएसटी जैसे राजस्व जुटाने वाले एक्ट तो कई बार बदल दिये गये लेकिन बेटियों को दहेज रूपी राक्षस से नहीं बचाया जा सका है।
एक मीडिया रिपोर्ट बताती है कि भारत में विवाह जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा है। शाही और धूमधाम के नाम पर हर साल 3 लाख करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं। भारत की जीडीपी सरकार करीबन 4 लाख करोड़ मानती है तो इससे पता लगाया जा सकता है कि यह 1 प्रतिशत के आसपास आ जाता है।
एक तरफ हम बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ का नारा देते हैं तो दूसरी ओर दहेज को कानूनी भाषा में इसको स्त्री धन के रूप में दर्ज किया जाता है। इसको दहेज के रूप में इसलिए संबोधित नहीं किया जाता क्योंकि 498ए आईपीसी के अनुसार दहेज देना और लेना दोनों अपराध है।
भारत में महिला शिक्षा नि:शुल्क का प्रावधान भी नहीं है। जो फीस बेटे को देने को होती है वही बेटी को भी देने का प्रावधान है। इस तरह से सरकार बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ को एक सामाजिक शक्ति नहीं बना सकी है। अगर महिला शिक्षा को मुफ्त कर दिया जाता तो आज उच्च शिक्षा में हालात इतने खराब नहीं होते।
अगर उच्च शिक्षा जिसको स्नातक या इससे अधिक तो यह 10 प्रतिशत से भी कम है। सरकार सिर्फ कॉलेज और स्कूल खोलकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है लेकिन अनेक ऐसे मामले हैं, जहां टीचर, मानव संसाधन और भौतिक संसाधनों की भारी कमी होती है। अनेक बार विद्यालयों की छत भी गिर जाती है।
महिला शिक्षा को बढ़ाने के लिए प्राइवेट स्कूलों को भी प्रोत्साहित नहीं किया जाता। दूसरी ओर भारत में यह भी एक समस्या है कि सरकारी अध्यापकों के ट्रांसफर भी एक बड़ा बिजनेस है। इसको तबादला उद्योग के नाम से जाना जाता है और चुनावों के आसपास तो यह और गंभीर मामला हो जाता है।
अनेक राजनीतिक दल तो चुनावों के समय धन हासिल करने के लिए तबादला उद्योग को बढ़ावा देते हैं।
आर्थिक मामलों में कमजोर होती जानकारी
दूसरी ओर देश में हम अगर लिक्विड मनी की बात करते हैं तो इसकी भारी कमी को देखा जा सकता है।
भारत जैसे देश, जिसको तीसरी दुनिया अर्थात विकासशील देश माना जाता है, वहां पर आज भी लोगों को सिर्फ इसलिए बेघर कर दिया जाता है क्योंकि वह समय पर ईएमआई नहीं चुका पाते। रिकवरी एजेंसियों में गुण्डों को पाला जाता है जो लोगों के घरों में घुस जाते हैं और मकान को खाली करवा लिया जाता है।
तरलता की कमी को देश की वित्त मंत्री भी मान चुकी हैं। जीएसटी, आयकर जैसे भारी-भरकम टैक्स के सहारे सरकार अपने खजाने तो भरती है किंतु इसके बावजूद बजट के लिए पर्याप्त धन जुटा पाती और बजट घाटा को पूरा करने के लिए अतिरिक्त नोट छापने की मंजूरी को प्राप्त कर लिया जाता है।
फायटर जेट का क्या हो रहा है
भारत सरकार अभी तक यह तय नहीं कर पायी है कि देश को कितने जेट चाहिये और कहां से खरीद की जानी है। इस वर्ष प्रधानमंत्री वाशिंगटन की यात्रा पर गये तो वहां पर एफ 35 की खरीद को लेकर चर्चा हुई। बात नहीं बन पायी। इसके बाद मामला फ्रांस की ओर चला गया और अतिरिक्त विमान की खरीद के लिए कदम बढ़ा दिया गया। इस दौरान पाकिस्तान के साथ हुए छोटे युद्ध के दौरान कोई तकनीकी मामले सामने आये। भारत फिर रूस की ओर कदम बढ़ा लिये। राष्ट्रपति पुतिन को भारत बुलाया गया। वहां पर एसयू श्रेणी के विमान खरीदने पर कोई घोषणा नहीं हो पायी।
क्रमलिन की ओर से कहा गया कि पुतिन रक्षा सौदों से ज्यादा निजी संंबंधों को महत्व देते हैं। भारत रूस से सबसे बड़ा हथियार खरीद देश है इसके बावजूद रूस ने अपने आधुनिक विमान भारत को बेचने के लिए गहरी रुचि नहीं दिखाई।
