डेयरी और कृषि उद्योग स्वदेशी ही रहना चाहिये? फिर किसानों के आंदोलन क्यों, मिलावटी खाद्य पदार्थ कहां तैयार हो रहे हैं?
श्रीगंगानगर। भारत सरकार अमेरिका के साथ कृषि और डेयरी सैक्टर में कोई समझौता नहीं करना चाहता है। इसका एक कारण भी बताया जा रहा है कि नई दिल्ली अपने देश के किसानों की हितों की सुरक्षा करना चाहती है। एक सच यह भी है कि सरकार अनेक फसलों का समर्थन मूल्य तो घोषित करती है किंतु इसमें आधी फसलों की भी खरीद नहीं होती और किसानों को समर्थन मूल्य से कम में फसल का बेचान करना होता है।
चीन और भारत की आबादी लगभग बराबर है। उसकी जीडीपी भारत से ज्यादा है और वहां पर भी खेती के लिए भारत जीतनी ही जमीन है।
भारत सरकार ने 80 से ज्यादा देशों के साथ कृषि क्षेत्र में समझौते किये हैं। इनमें इजरायल, चीन और न्यूजीलैण्ड सहित कई देश शामिल हैं। कीवी न्यूजीलैण्ड का सदाबहार फल है जो भारत के गांव और हर शहर में बिक रहा है। चीन के बीज से तैयार किया गया खीरा भी आम बाजार में आसानी से उपलब्ध है।
नई दिल्ली में मोदी सरकार इससे पहले भी आसियान देशों के साथ कृषि समझौता करने से इंकार कर दिया था। चीन सरकार ने आग्रह भी किया था किंतु सरकार ने इसके बावजूद समझौते में शामिल होने से इंकार कर दिया था। इस तरह से एक बड़े गु्रप के साथ भारत ने कृषि समझौता नहीं किया।
चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा हर साल कई हजार करोड़ रुपये होता है, इसके बावजूद भी वह चीन से आयात करता है। इसी तरह से किसानों को सब्सिडी देकर भी उनको मजबूत किया जा सकता है। अमेरिका और अन्य देश आज भी डब्ल्यूटीओ के बावजूद किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं।
सबसे ज्यादा आंदोलन, समस्या फिर भी कम नहीं होती
दुनिया में सबसे ज्यादा आंदोलन किसानों को करने पड़ते हैं। हाल ही में बैल्जियम, फ्रांस आदि अनेक देशों में आंदोलन हुए। बैल्जियम में तो किसान भारत की तरह ट्रैक्टर लेकर मैदान में आ गये और रास्तों को जाम कर दिया। हजारों लोग सडक़ों पर थे और इनमें महिलाओं की संख्या भी पुरुषों के मुकाबले कम नहीं थी।
इसी तरह से भारत में अनेक आंदोलन दशकों से चल रहे हैं। सूरतगढ़ के टिब्बा क्षेत्र कहे जाने वाले इलाके में सिंगरासर-पल्लू के बीच नहर के निर्माण की मांग की जा रही है और किसानों के साथ घरेलू महिलाएं भी बाजार में लाठियां लेकर आ गयीं। हजारों महिलाओं ने इस आंदोलन में भाग लिया। घड़साना-रावला आंदोलन करीबन पांच साल तक बड़े स्तर पर चला। इस दौरान गोलियों से कम से कम पांच किसानों की मौत हो गयी।
पंजाब के किसान दो साल तक एमएसपी की मांग करते हुए दिल्ली की सर्दी में डेरा जमाकर बैठे रहे। इसके उपरांत एक साल तक हरियाणा सीमा पर आंदोलन किया जिसको शंभू बॉर्डर का आंदोलन कहा जाता है।
अमेरिका से अखरोट आने से भावों पर नियंत्रण होगा
इस समय अनेक कृषि उत्पाद अरब से आ रहे हैं। अरब के देशों के साथ खजूर सहित अनेक उत्पादों के लिए समझौता हुआ है। उस समय भारत के किसान का होने वाला घाटा मोदी सरकार शायद नहीं देख पायी।
अमेरिकी अखरोट जिसको ‘ड्राई फू्रट’ कहा जाता है इसके साथ बादाम आदि भी भारी संख्या में उत्पादित होते हैं और यह उत्पाद पूरे भारत में उत्पादित नहीं होते, इनको विदेशों से भी आयात किया जाता है यहां तक कि पूर्व में पाकिस्तान के कश्मीर से भी लाया जाता था।
जब पाकिस्तान के साथ ड्राई फू्रट पर समझौता हो सकता है तो अमेरिका के साथ किसी बात को लेकर एतराज है।
भारत में मांग के अनुरूप उपलब्ध नहीं है दूध
हर दिन समाचार पत्रों में इस तरह की खबरें प्रकाशित होती हैं कि नकली और रसायनयुक्त दूध बरामद किया गया है। क्रीम, घी, मक्खन, दही और अन्य सामान बरामद किया जाता है। इसका अर्थ साफ है कि मांग के अनुरूप दूध उपलब्ध नहीं है। लोग नकली और जहरीला पदार्थ बनाकर बेच रहे हैं और कमजोर कानून के कारण इस पर कार्यवाही भी नहीं हो पाती। अमेरिका से पूर्व में भी गायों का आयात किया गया था और अमेरिकी गायों का दूध भारतीय गायों से ज्यादा उपलब्ध होता था। इस तरह से डेयरी उद्योग को खोले जाने की मांग सांध्यदीप नहीं बल्कि वक्त कर रहा है। ताकि लोगों को आसानी से घी और दूध जैसे विशेष पदार्थ आसानी से उपलब्ध हो सकें।
