Monday, September 29, 2025
भाजपा को राजस्थान में एक सूत्र में कैसे परोसेंगे पीएम मोदी?
श्रीगंगानगर। सोमवार से आरंभ हुए नये सप्ताह के 29 सितंबर की अगर शाम के प्रमुख समाचारों पर नजर डालें तो अमेरिका सरकार ने भारतीय फिल्म निर्माओं को भी एक बड़ा झटका दिया है। अब गैर अमेरिकी फिल्मों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जायेगा। वहीं कनाडा सरकार ने एक अभूतपूर्व निर्णय में लारेंस गिरोह को आतंकवादी संगठन करार दिया है। वहीं सबसे पहले राजस्थान भाजपा पर नजर डाली जाये तो सवाल उठता है कि एकसूत्र में पार्टी को बांधे रखना आसान कार्य नहीं है।
पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजस्थान के बांसवाड़ा क्षेत्र में थे जो आदिवासी बाहुल्य इलाका माना जाता है। मंच पर पीएम के अलावा पूर्व सीएम वसुंधरा राजे, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी सहित कई अन्य चेहरे थे।
मंच पर पीएम मोदी सभी का आभार व्यक्त कर रहे थे। सभी नेता राइट साइड में थे और जब वे वसुंधरा राजे के नजदीक पहुंचे तो पूर्व मुख्यमंत्री ने अचानक उनके सामने आ गयी। हजारों कार्यकर्ता मंच से नीचे देख रहे थे और पीएम से वसुंधरा राजे ने अपनी नाराजगी व्यक्त की और इशारों में बताया भी कि वे मौजूदा हालात में खुश नहीं हैं।
राजस्थान में इस समय अनेक गुट है। बड़े नेताओं को राज्य से बाहर ले जाने में मोदी पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाये और वसुंधरा ने पार्टी ने प्रति निष्ठा को ध्यान में रखते हुए सीधे पीएम मोदी से सवाल कर लिये।
एक विशाल मंच जहां हजारों लोगों की उपस्थिति थी और पीएम वसुंधरा राजे को अपने बयानों से संतुष्ट नहीं कर पाये। यह क्लिप पूरे राजस्थान में वायरल हो गयी। सवाल वही है। राज्य में मंत्रीमंडल के पुनर्गठन को लेकर पहले चर्चा हुई थी किंतु बाद में माहोल शांत हो गया क्योंकि पीएम से दिल्ली में वसुंधरा राजे और सीएम भजनलाल शर्मा दोनों ही मिलने के लिए गये थे।
जिस तरह से वसुंधरा राजे ने पीएम से सवाल किये, उससे संकेत मिलता है कि पार्टी की गुटबाजी को समाप्त करने के लिए प्रधानमंत्री को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात करनी पड़ सकती है।
अमेरिका का एक और प्रहार!
दुनिया को एक बार पुन: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हिलाकर रख दिया है। सोमवार सुबह उन्होंने सोशल मीडिया पर एक जानकारी दी कि वे अमेरिका के बाहर बनने वाली फिल्मों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा रहे हैं।
अभी हाल ही में उन्होंने दवा निर्मित करने वाले फार्मा सैक्टर को एक बड़ा झटका दिया था और 100 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था। इस टैरिफ से भारत का फार्मा उद्योग भी बुरी तरह से प्रभावित होगा। इसका कारण है कि जर्मनी के बाद भारत ही ऐसा देश है जो अमेरिका को सबसे ज्यादा दवा का निर्यात करता है।
जर्मनी पर इस कारण टेरिफ का असर नहीं होगा क्योंकि यूरोपियन यूनियन ने ट्रम्प के साथ टैरिफ डील कर ली थी और उन पर वही टैरिफ लगेगा जो डील में अंकित है अर्थात अतिरिक्त टैक्स नहीं देना होगा।
वहीं भारत सरकार और ट्रम्प प्रशासन के बीच अभी ट्रेड डील नहीं हो पायी है। इस कारण फार्मा उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हुआ। भारत का शेयर बाजार पिछले 6 दिनों में 1600 प्वाइंट नीचे गिर गया है। शेयर बाजार के जानकार अनुमान लगा रहे हैं कि 15 लाख करोड़ रुपये इस गिरावट के कारण स्वाह हो गये। इसको इस तरह से भी कहा जा सकता है कि बीएसई-निफ्टी का बाजार मूल्य कम हो गया।
विदेशी निवेशक आईटी सैक्टर में किये गये अमेरिकी प्रशासन के बदलाव के बाद एशियाई बाजारों में ज्यादा विश्वास नहीं कर रहे हैं।
अब भारतीय फिल्म जगत की चर्चा की जाये तो बॉलीवुड की अनेक फिल्में अमेरिका के मल्टीप्लैक्स में चलायी जाती हैं। क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीयों की संख्या हर साल इजाफा हो रहा है और वह करोड़ों की संख्या में है।
अब बॉलीवुड की फिल्मों को भी संभवत: अमेरिका के सिनेमा घरों में नहीं चलाया जा सकेगा क्योंकि टैरिफ के कारण वहां के वितरकों को काफी नुकसान होने की संभावना है। हालांकि अभी पूरी जानकारी उस समय सामने आयेगी जब ट्रम्प कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर कर देंगे।
लारेंस गिरोह को आतंकवादी संगठन घोषित किया
कनाडा सरकार ने भारतीय गैंगस्टर लारेंस के गिरोह को कनाडा में आतंकवादी संगठन घोषित किया है। संवाद सेवा के अनुसार भारत सरकार और कनाडा के बीच हुई वार्ता के बाद यह निर्णय लिया गया।
विभिन्न समाचार एजेंसियां इस खबर को प्रमुखता से प्रसारित कर रही है। सरकारी प्रवक्ता ने कहा है कि इससे कनाडा में भय और आतंकवाद का माहौल बन रहा है। बार-बार धमकियां मिल रही हैं। लारेंस इस समय गुजरात जेल में बंद होना बताया गया है।
Sunday, September 28, 2025
केजरीवाल का पंजाब प्रशासन में हस्ताक्षेप पार्टी को कमजोर कर रहा है!
श्रीगंगानगर। पंजाब इस समय भीषण तबाही के मंजर को देखने के उपरांत बहाली की ओर देख रहा है। राज्य सरकार 5 एकड़ वाले किसानों को मुफ्त में बीज देगी, लेकिन बड़े जमींदार का नुकसान नहीं हुआ?
मार्च 2022 में पंजाब ने परिवर्तन का मानस बना रखा था और इस कारण दशकों पुरानी पार्टी कांग्रेस, अकाली दल और भाजपा को परास्त करते हुए 117 सीट में से 92 पर जीत हासिल कर आम आदमी पार्टी की सरकार का गठन किया। लोगों को उम्मीदें थी कि पलायन, बेरोजगारी और अन्य किसानों की समस्याओं का अंत होगा। नशा का नाश होगा।
मुख्यमंत्री के पद पर मशहूर कैमेडियन भगवंत मान को सीएम नियुक्त किया गया। प्रदेश पार्टी की कमान भी उनके पास थी जो हाल ही में नये प्रदेश अध्यक्ष को स्थानांतरित की है।
पंजाब में सरकार के गठन के साथ ही दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों में सत्ता हाथ से निकल गयी। तीन बार सीएम बने पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल बेरोजगार हो गये।
दिल्ली में शराब घोटाले के चलते अरविंद केजरीवाल को जेल जाना पड़ा। इसके बाद दिल्ली से सीएम की कुर्सी भी गयी। पार्टी की प्रदेश से सत्ता भी समाप्त हो गयी। अब एक राज्य पंजाब ही है जिसके सहारे आगे विधानसभा चुनावों में शिरकत की जा सकती है।
अब केजरीवाल बार-बार पंजाब के चक्कर काट रहे हैं। किसान पार्टी से साफ तौर पर नाराज दिखाई दे रहे हैं और बाढ़ के समय उन्होंने अपने वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल किये।
बिहार, बंगाल और तमिलनाडू विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी का कोई वजूद नहीं है इसलिए इन चुनावों के लिए इस पार्टी की चर्चा भी नहीं हो रही। इस पार्टी की नजर गुजरात पर है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनावों में वोट प्रतिशत के आधार पर वह राष्ट्रीय राजनीतिक दल बन गया था।
बाढ़ के दौरान ही सीएम क्यों हुए बीमार?
मुख्यमंत्री भगवंत मान बाढ़ के दौरान बीमार हो गये और अस्पताल में जाकर भर्ती हो गये। इससे पहले के तीन सालों में वे कभी बीमार नहीं हुए थे। केजरीवाल के साथ प्रदेश के बाढ़ का दौरा करने के लिए भी नहीं गये।
केजरीवाल की बार-बार पंजाब यात्रा बताती है कि वे पंजाब से काफी कुछ ‘चाहते’ हैं। पहले यह चर्चा थी कि वे पंजाब का पुत्र बनकर सीएम की कुर्सी संभालेंगे, लेकिन मीडिया की चर्चाओं और पार्टी के भीतर ही सवाल उठने के बाद यह चर्चा सिर्फ चर्चा बनकर रह गयी।
मुख्यमंत्री भगवंत मान के पहले कई जोक्स सोशल मीडिया पर वायरल होते थे जब वे जनसभा करने के लिए जाते थे। प्रशासन पर उनकी कमजोर पकड़ है, यह प्रमाण उस समय मिल गया जब पंजाब-हिमाचल में अनुमान से अधिक बरसात हो गयी और इसके साथ ही सिस्टम पंगु हो गया।
इससे पहले वे संगरूर से सांसद रहते हुए संसद के सुरक्षा नियमों को नजरांदाज कर वीडियो बनाते हुए सामने आये थे, जिसके बाद उनको संसद से निलम्बित भी कर दिया गया था।
इसके उपरांत भी सांसद और सीएम के पद की मर्यादा को उच्च स्तर पर नहीं ले जाया जा सका।
बाढ़ के हालात के बाद भी सभी जमींदारों को फौरी राहत नहीं मिल पायी है। 2 लाख एकड़ से ज्यादा फसल बर्बाद होने की जानकारी मीडिया रिपोर्ट से सामने आयी है।
चुनावों से पूर्व खजाना भरा होने और पैसे की किसी भी प्रकार की कमी नहीं आने देने का वायदा किया गया था और अब जब पंजाब के किसानों को मदद की जरूरत महसूस हुई तो पांच-पांच एकड़ को ही बीज व अन्य सुविधाएं दिये जाने की जानकारी सामने आयी है।
1600 करोड़ पंजाब को केन्द्र की सरकार देगी। इसके बाद सहायता लेने और पूरे नुकसान की रिपोर्ट के साथ सीएम को दिल्ली जाना चाहिये था ताकि अतिरिक्त मदद लेकर वे सभी किसानों को राजी करते। उनके जीवन को वापिस पटरी पर लाते।
आम आदमी पार्टी के पास एक ही राज्य बचा है और वह भी तीन साल से ज्यादा का समय हो चुका है। सत्ता विरोधी लहर चुनावों के समय दिखाई ही देती है। 2027 के फरवरी-मार्च माह में चुनाव होने है और ज्यादा वक्त भी पार्टी को एक सूत्र में बांधने का भी नहीं रहा है। अगर पंजाब से सत्ता हाथ से निकल जाती है तो गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए चंदा ही जुटाना मुश्किल होगा।
कनाडा में भी पीएम बदल चुके हैं। तीन वर्षों के दौरान लाखों पंजाबी कनाडा गये थे किंतु वहां पर मंदी आने के कारण छात्र वापिस लौट रहे हैं। इस तरह से जो जस्टिन ट्रूडो और केजरीवाल ने चक्रव्यूह की रचना की थी, वह तो कामयाब नहीं हो पायी।
आम आदमी पार्टी में अब ज्यादा नेता भी नहीं रहे हैं जो केजरीवाल की बात को काट सकें। वरिष्ठ नेताओं में मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, भगवंत सिंह मान आदि ही चेहरे हैं। अब पंजाब की सत्ता में केजरीवाल का हस्ताक्षेप होने के कारण भगवंत मान को विरोधी दलों के कटाक्ष का भी सामना करना पड़ रहा है।
Thursday, September 25, 2025
दुनिया भर में फैले अमेरिकी सैन्य अधिकारियों को आपात बैठक के लिए बुलाया
न्यूयार्क। दुनिया भर में अमेरिका की सेना अनेक देशों में तैनात है और अनेक बेस कैम्प भी हैं, इन सभी के कंट्रोलिंग अधिकारियों को रक्षा मंत्री (युद्ध मंत्री) पीट हेगसेथ ने आपात बैठक के लिए बुलाया है।
इस आपात बैठक की जानकारी जैसे ही बाहर आयी, सभी खुफिया एजेंसीज के कान खड़े हो गये।
जो जानकारी सामने आयी है, उसके अनुसार युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने सैन्य अधिकारियों को भेजे गये तार में कहा गया है कि वे अगले सप्ताह अमेरिका पहुंचें। 2 से लेकर चार स्टारधारी अधिकारियों को बुलाया गया है।
हालांकि अभी यूएन सभा चल रही है और अमेरिकी प्रशासन उस तरफ ज्यादा व्यस्त है। इस बीच युद्ध मंत्री का अधिकारियों को तार भेजना, इस बात का संकेत है, कहीं न कहीं अमेरिका अब अपनी तैयारियों की समीक्षा कर रहा है।
यह भी संभवत: पहली बार होगा कि पीट हेगसेथ पहली बार अपने अधीनस्थ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। ध्यान देने योग्य यह बात भी है कि पूर्व प्रशासन के अधीन कार्य करने वाले अनेक उच्चाधिकारियों को पदमुक्त कर दिया गया था।
वाशिंगटन जैसी सुपर परचेज पॉवर दुनिया में शायद नहीं है?
वाशिंगटन। रूस-युक्रेन युद्ध को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस तरह से डे-फस्र्ट से गतिशील थे, अब उस तरह से नहीं है, क्योंकि उनकी रूस के साथ चल रही बातचीत के बाद भी सार्थक परिणाम सामने नहीं आये हैं, हालांकि दोनों देश विदेश मंत्री स्तर पर वार्ताओं का दौर चलाये हुए हैं।
पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि वे युद्ध को समाप्त करवायें। प्रशासन बदला तो ट्रम्प ने भी पीएम को वाशिंगटन डीसी बुलाकर यही बात दोहराई। इसके बाद वे अपने स्तर पर भी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के साथ अनेक बार वार्ता कर चुके हैं।
पुतिन ने शांति वार्ता के लिए विश्व के सामने कुछ शर्तें रखी हुई हैं और उनकी पालना करवाने के बाद ही वे युद्ध को समाप्त कर सकते हैं।
इन सबके बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, लेकिन मोदी को भी देश के भीतर विरोधी दलों से सामना करना पड़ रहा है और तीन बड़े राज्यों बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडू में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन तीन राज्यों के माध्यम से ही राज्यसभा में भी पकड़ बनाये रखी जा सकती है।
भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी मोदी को आलोचनाओं और पहली बार विरोधी गुट को भी संभालने की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है और वे रूस-युक्रेन के लिए उतना समय नहीं निकाल पा रहे हैं कि उसको समाप्त करवाया जा सके। कुछ दिन पूर्व ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री मास्को की यात्रा कर उनको भारत आने का निमंत्रण देकर आये थे और दावा किया गया था कि पुतिन नई दिल्ली में होने वाले वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए नवंबर माह में आयेंगे।
जीएसटी-2.0 मोदी को बिहार जीता पायेगा
अब हमें फ्लैश बैक में जाते हुए 2024 का 15 अगस्त का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण सुनना होगा। उन्होंने उस दिन कहा था कि जिनका लिया है, उनको लौटाया जायेगा। इसका विस्तार से उल्लेख उन्होंने एक साल तक नहीं किया किंतु इस साल 15 अगस्त के बाद जीएसटी-2.0 लेकर आ गये। इसको एक्ट में संशोधन कहा गया और इसका अब प्रचार भी हो रहा है। प्रत्येक दिन खाने-पीने की जिन चीजों का गरीब से लेकर अमीर तक खरीद कर अपना पेट भरते हैं, उन पर टैक्स कम किया गया। कारों को भी सस्ती किया गया क्योंकि ट्रम्प प्रशासन ऑटो और स्टील पर 25 प्रतिशत टैक्स लगा चुके थे और इसके बाद 50 प्रतिशत कर दिया गया। भारत से कारों का निर्यात यूएसए में भी होता है। जिन वस्तुओं को उन्होंने ही महंगा किया था, खुद ही सस्ता किया और फिर उसको अपनी उपलब्धि भी बताया गया।
अपरोक्ष टैक्स परोक्ष टैक्स से कहीं ज्यादा वसूला गया। देश में सेविंग कम हो गयी और जो धन घरों में जमा था वह पहले बैंक और फिर दिल्ली पहुंच गया। वहां से मित्रों तक भी पहुंचा। हालात यह हो गये कि बैंकों के पास भी कैश का प्रवाह कम हो गया। यह बात वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी मीडिया के सामने कबूल की और एक वक्तव्य जारी किया।
पेट्रोलियम, टोल टैक्स और बैंकिंग!
जीएसटी रिफार्म के आधार पर सरकार प्रचार कर रही है लेकिन अभी यह भी देखने वाला है कि अन्य क्षेत्रों में जो लूटा जा रहा है, उसको कैसे कम किया जायेगा।
टोल टैक्स 2 रुपये प्रति किमी या इससे भी कहीं ज्यादा वसूला जा रहा है।
अगर इसको बेहतर तरीके से समझना हो तो हमें व्यवहारिक रूप से लुधियाना-जालंधर हाइवे पर यात्रा करनी होगी। फगवाड़ा के निकट एक पुल को क्रॉस करने के लिए 350 रुपये वन साइड टैक्स लिया जा रहा है। इसको टोल आतंकवाद के रूप में भी कहा जा सकता है। इस रास्ते पर 25 घंटे में आवागमन करने पर 700 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। 24 घंटे में 525 रुपये खर्च हो जाते हैं।
पारदर्शिता के नाम पर इसको ऑनलाइन वसूला जा रहा है, लेकिन ध्यान देना होगा कि यह टोल एक-दो साल से नहीं बल्कि दशकों से वसूला जा रहा है और हर दिन सैकड़ों वाहन आवागमन करते हैं। कुछ समय पहले तक यह वन साइड 100 रुपये का था। फिर कुछ अंतराल के बाद टैक्स को बढ़ाया गया और अब इसको 350 रुपये तक वन साइड कर दिया गया है।
क्या सोचना नहीं चाहिये कि एक टोल प्लाजा देश की आर्थिक स्थिति को बेहतर कर रहा है जैसा कि पीएम ने बांसवाड़ा में कहा कि हालात बेहतर होने पर जीएसटी को और कम किया जायेगा। आदिवासी क्षेत्र में उनका भाषण स्वादिष्ट होगा लेकिन यह बिहार-बंगाल चुनाव और अंतरराष्ट्रीय दबाव का हिस्सा है।
पेट्रोलियम क्षेत्र में भी बड़े-बड़े उद्योगपति सक्रिय हैं और इस तरह से उनकी कंपनियों को भी सीधा लाभ पहुंचाने के लिए पेट्रोल पर भी टैक्स आतंकवाद का असर दिखाई देता है। भूटान में पेट्रोल 75 रुपये और भारत में लगभग 100 रुपये। एक लीटर के 25 रुपये तक अंतर है। भूटान भारत से ही सभी प्रकार का पेट्रोल आयात करता है।
वर्ष 2014 से लेकर अब तक बैंकिंग सैक्टर में भी 80 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खाताधारकों के पैसे इसलिए काट लिये गये क्योंकि उनके पास बचत या चालू खाता में सरकार के नियमों के अनुसार राशि जमा करवाने के लिए पैसे नहीं थे। कुछ बैंकों ने अब सरकार के निर्देशों के बाद बचत खाता में बैलेंस के नाम पर शुल्क लेना बंद कर दिया गया है किंतु चालू खातों में अभी भी है जबकि पीएम एमएसएमई का राग अलाप रहे हैं।
एमएसएमई का अर्थ छोटे, मध्यम व्यवसाय हैं। इस सैक्टर को कोराना राहत देने के लिए 20 लाख करोड़ रुपये 2020 में रखे गये थे किंतु इस दौरान सरकार ने एमएसएमई के टर्नओवर को भी काफी बढ़ा दिया ताकि इससे उनके मित्रों को भी लोन दिया जा सके और उनकी कंपनियां इसमें लाभ लेने में सफल भी रहीं। बाकी तो बैंकों के चक्कर ही काटते रह गये।
सरकार जनता के सामने मीडिया के माध्यम से पारदर्शिता के नाम पर बदलाव की जानकारी देती है, लेकिन उनके फलसफा का इन्द्राज आम जनता नही कर पाती है और हालात यह हो रही है कि बैंक भी खाली हो रखे हैं। इन बैंकों को हाउसिंग या ऑटो लोन ने खाली नहीं किया है बल्कि जो हजारों करोड़ रुपये के एक-एक ऋण दिये गये, उसका परिणाम है।
विदेश नीति की हार
रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन भारत आने के लिए तैयार नहीं है। अमेरिका के साथ संबंधों को खराब कर लिया गया। पहले पीएम मोदी ने स्वयं अमेरिका जाने से इन्कार कर दिया और अब रुपया अस्थिर होकर 89 रुपये की ओर प्रति डालर बढ़ रहा है, उससे सरकार भी चिंतित नजर आने लगी है। स्टॉक मार्केट भी कमजोर हो रहा है क्योंकि विदेशी निवेशक अपनी धनराशि निकाल रहे हैं।
विदेश मंत्री वाशिंगटन पहुंचे तो वहां पर संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो से भी मुलाकात करते हुए दोनों राष्ट्राध्यक्षों की मीटिंग के लिए चर्चा की गयी।
वर्ष 2018 में आपदा में अवसर की तलाश का मंत्र देने वाले नरेन्द्र मोदी इस आपदा में अवसर तलाश नहीं पा रहे हैं।
रूस पर प्रतिबंधों के कारण स्विफ्ट से भारतीय धन जो वहां निवेश किया हुआ था अथवा लाभांश था, वह वापिस नहीं आ पा रहा है। अमेरिका के चर्चित ऑटोपेन भी इस मामले में कोई मदद नहीं कर पाया।
इस आपदा में अवसर की तलाश करते हुए उन्होंने ब्रिक्स करंसी आरंभ करने में चीन-रूस का एक संयुक्त संगठन बनाने का प्रयास किया किंतु इस पर भी अभी तक पानी फिरा हुआ है।
असल में अमेरिका में 32 करोड़ की आबादी में से 20 करोड़ ऐसे हैं, जिनकी क्रय शक्ति दुनिया में सबसे ज्यादा है। यूरोप, भारत, चीन, इसका फायदा उठाते हैं और अब इतना बड़ा बाजार तलाश कर पाना तीनों ही देशों के लिए मुश्किल है।
भारत का हजारों करोड़ का जो आइटी सैक्टर है, वह भी अमेरिका की मदद से ही चल पा रहा है। यूएसए में 70 प्रतिशत आईटी पेशेवर भारत से हैं। 20 प्रतिशत चाइनीज हैं और शेष 10 प्रतिशत अन्य क्षेत्रों से हैं।
टाटा, अम्बानी, महिन्द्रा जैसे सभी बड़े उद्योगपतियों की अमेरिका में आईटी कंपनियां स्थापित हैं। इसके अतिरिक्त बेनामी सम्पत्तियां भी हैं। अनेक अधिकारियों का भी वहां पर निवेश है। अब सभी लोग राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर देख रहे हैं कि वे क्या निर्णय लेते हैं।
ट्रम्प ने सउदी, यूरोपीय यूनियन, ब्रिटेन, साउथ कोरिया, जापान सहित कई अन्य देशों के साथ नई ट्रेड डील कर ली है। चीन, रशिया, भारत और कनाडा सहित कुछ अन्य देशों पर टैक्स अभी भी ज्यादा है। अमेरिकी मीडिया मानता है कि अगर ट्रम्प टैरिफ कम नहीं करते हैं तो इससे दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगना तय है।
कनाडा ने मंदी को स्वीकार कर लिया है। भारत के लिए कहा जा रहा है कि जीडीपी कमजोर होगी। चीन अपनी रफ्तार पहले ही खो चुका है और अमेरिकी बाजार तक वह उसी तरह की अप्रोच नहीं रख पाता है तो इतनी बड़ी परचेज पावर वाला अन्य कंट्री नहीं मिल पायेगा।
Wednesday, September 24, 2025
मैक्रां के साथ थ्रिलर ड्रामा था?
वाशिंगटन। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रां के साथ जो घटनाक्रम मंगलवार को न्यूयार्क में यूएन की सभा में जाते समय हुआ, वह एक थ्रिलर मूवी से कम नहीं था। हालांकि वे पैदल ही यूएन की सभा में पहुंच गये किंतु एक राष्ट्रपति को पैदल चलते देखकर वीवीआईपी मूवमेंट से होने वाली परेशानियों की जानकारी भी सामने आती है।
मैक्रां और डोनाल्ड ट्रम्प के रिश्ते इस समय सहज नहीं है। यूरोपियन यूनियन भी दो तरफ चल रही है और नाटो में भी एकता नहीं दिखाई दे रही। यहां बता दें कि फ्रेंच राष्ट्राध्यक्ष का काफिला यूएन की ओर मूव कर रहा था कि उनको पुलिस कार्मिकों ने रोक दिया, क्योंकि उस समय ही राष्ट्रपति ट्रम्प का काफिला निकल रहा था। मैक्रां ने पुलिस कार्मिक को बताया कि वे फ्रेंच प्रेजीडेंट हैं, पुलिसकर्मी ने उनको बताया कि वे उनको पहचानते हैं, लेकिन वे उनको वाहनों के साथ नहीं जाने दे सकते। इस पर मैक्रां ने ट्रम्प को फोन मिलाया और अपने साथ घटना की जानकारी दी तो ट्रम्प ने कह दिया कि अमेरिका में किसी की सिफारिश नहीं चलती।
गाजा को मान्यता देने को लेकर नाटो, जी-7, यूरोपियन यूनियन में मतभेद सामने आ गये। ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस ने फिलीस्तीन को मान्यता दे दी, किंतु जर्मनी, ईटली आदि ने खुद को इन चारों देशों से अलग कर लिया।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रां फिलीस्तीन के लिए मुहिम चलाये हुए थे जो अमेरिका की नीति के खिलाफ था। उन्होंने यूएन में कई राष्ट्राध्यक्षों से मुलाकात भी की। इस तरह से पश्चिमी देशों के तीन समूहों में दो विचार सामने आ गये। एक ट्रम्प का था और दूसरा ब्रिटेन-फ्रांस का।
इस तरह से नाटो, जी-7 और यूरोपीयन यूनियन अलग-अलग दिशा की ओर चल पड़े। इस बीच ही मैक्रां को एक आम आदमी की तरह चलकर यूएन की सभा में पहुंचना पड़ा तो दूसरी ओर राष्ट्रपति ट्रम्प व प्रथम महिला मिलेनिया ट्रम्प को स्वचलित सीढिय़ों ने बीच रास्ते पर खड़ा कर दिया।
राष्ट्रपति को भी एक आदमी की तरह ही दूसरी सीढिय़ों से जाना पड़ा। वे जब भाषण देने के लिए पहुंचे तो टेलीप्रॉम्पटर खराब मिला। स्वचलित सीढियां और टेलीप्रॉम्पटर के खराब होने पर उन्होंने यूएन सभा में हंसी का माहौल खड़ा कर दिया।
ट्रम्प ने कहा, उन्हें टेलीप्रॉम्पटर खराब मिलने से उन्हें कोई परेशानी नहीं है क्योंकि वे भाषण को अपने दिल से देते हैं। उन्होंने एक एशियाई राष्ट्राध्यक्ष का नाम लिये बिना एक तंज कस दिया। इस तरह से यूएन की सभा में हंसी-खुशी का माहौल था।
इस माहौल को उन्होंने अपने तेज-तर्रार भाषण के जरिये बदला भी और कहा, रूस-युक्रेन युद्ध को समाप्त किया जा सकता है, लेकिन कुछ देश ऐसा नहीं होने दे रहे।
यूरोपीय देशों को सलाह दी कि अब वक्त आ गया है कि वे अपने देश की सीमाओं को सुरक्षित कर लें।
रूस, भारत के विदेश मंत्रियों के साथ रूबियो की मुलाकात
विदेश मंत्री तथा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मार्को रूबियो ने दो दिनों के भीतर रूस व भारत के विदेश मंत्रियों के साथ लम्बी बैठकें की।
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ बंद कमरे में बैठक की और इसकी जानकारी औपचारिक रूप से देर रात तक नहीं दी गयी।
वहीं अमेरिकन मीडिया का मानना है कि रूबियो और भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के बीच मुलाकात में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी-राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच बैठक पर चर्चा की।
हालांकि यूएन सभा चल रही थी और प्रधानमंत्री ने अपने विजिट को कैंसिल कर दिया था। अब नई दिल्ली चाहती है कि एक बैठक दोनों देशों के शिखर नेताओं के बीच हो।
राष्ट्रपति ट्रम्प दशहरा उत्सव के उपरांत एशियाई देशों की यात्रा करने वाले हैं। संभव है कि वे मलेशिया में होने वाले आसियान और दक्षिण कोरिया में एशिया-प्रशांत महासागर की सुरक्षा को लेकर होने वाली बैठक में शिरकत करें। ट्रम्प के कार्यक्रम को अभी अन्तिम रूप नहीं दिया गया है।
यह भी संभव है कि नई दिल्ली की मंशा हो कि एशिया विजिट में जब राष्ट्रपति ट्रम्प दक्षिण कोरिया, मलेशिया और जापान की यात्रा करें तो उस समय वे भारत को भी इसमें शामिल करते हुए दूसरे कार्यकाल ही पहली यात्रा नई दिल्ली की करें।
भारत में इस साल नवंबर में क्वाड का शिखर सम्मेलन होना है और अगर अमेरिका इसमें शामिल नहीं होता है तो इसका अस्तित्व भी प्रभावित होगा। इस समूह में जापान-ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं।
रूसी प्रेजीडेंट भी भारत की यात्रा को लेकर अभी तक उत्साह में नहीं
मास्को में इस समय इस बात पर चर्चा नहीं हो रही है कि राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन की नई दिल्ली यात्रा सुनिश्चित हो। भारत ने नया रक्षा समझौता करना है और वह कभी फ्रांस और कभी रूस की ओर रुख कर रहा है।
पुतिन ने कुछ संदेश भारत सरकार को दिया हुआ है। इसमें कुछ शर्तें भी शामिल हैं। अगर उनकी पालना हो जाती है तो पुतिन भारत की यात्रा कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन दिनों एक बार फिर स्वदेशी का संदेश दे रहे हैं। कंघी का भी उन्होंने उदाहरण दिया और चिप से शिप तक सभी भारत में बनाये जाने का आह्वान किया। किंतु यह भी याद होना कि प्रधानमंत्री का कार्यक्राल संभालने के उपरांत मोदी ने भारत की सरकारी कंपनियों भारत पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल कार्पोरेशन और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम का पैसा रूसी कंपनियों में निवेश करवाया था। यह राशि 6 अरब डॉलर या उससे ज्यादा हो सकती है। जो करीबन 53 हजार करोड़ रुपये हैं। वहीं 12 हजार करोड़ रुपये का लाभांश भारत सरकार को नहीं मिल पा रहा है क्योंकि अमेरिका सरकार ने रूस को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा स्थानांतरण तंत्र से बाहर कर दिया है। इस राशि का स्थानांतरण तभी हो पायेगा जब ट्रम्प प्रशासन मास्को पर प्रतिबंधों को समाप्त करेगा। अब जो सस्ता कच्चे तेल का राग बार-बार सामने आ रहा था, उसका मूल कारण यही था। सच्चाई दुनिया के सामने लाने के बजाय उसको छुपाया गया तो ट्रम्प ने भारतीय कंपनी नायरा को प्रतिबंधित कर दिया। अब इस कहानी का अंत तभी होगा जब रूस को फिर से स्वीफट प्रणाली में शामिल किया जायेगा। चीन-ब्राजिल जो ब्रिक्स सिस्टम आरंभ करने की वकालत कर रहे हैं, उसके पीछे भारत की कूटनीति है जिसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता नहीं मिल रही है। इस कारण रूस, अमेरिका के प्रेजीडेंट तभी भारत आयेंगे जब यूक्रेन में शांति स्थापित हो सकेगी।
Sunday, September 21, 2025
एच 1 बी वीजा में बदलाव के लिए मोदी की नीतियां जिम्मेदार नहीं?
श्रीगंगानगर। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एच 1 बी वीजा धारकों को प्रतिवर्ष 1 लाख डॉलर अदा करने का आदेश जारी किया। इससे यूएसए की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी टेक कंपनियों में हडक़म्प मच गया। उधर भारत सरकार में भी इसी तरह का हाल था। आखिर में देर रात को ट्रम्प प्रशासन ने स्पष्टीकरण दिया या बैकफुट पर आकर एक लाख डॉलर की राशि को एकमुश्त बताया अर्थात हर साल पैसे नहीं देने होंगे। इसके बाद भारत और अमेरिका में माहौल शांत हुआ।
अमेरिका सरकार ने जो फैसला किया, उसके लिए किसी व्यक्ति विशेष को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
असल में यह भारतीय शासक नरेन्द्र मोदी की अहम की लड़ाई बन गयी है। वे भारतीयों के बीच अपनी पैठ बनाये रखने के लिए जन्मदिन को एक पखवाड़ा तक मनाते हैं। फ्रांस, जापान, जर्मनी आदि विकसित राज्यों या बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे गरीब स्टेट में शासनाध्यक्ष इस तरह का माहौल नहीं बनाते हैं।
अब अगर फैक्ट को चैक किया जाये तो सामने आता है कि ट्रम्प से अपनी मित्रता का गुणगान स्वयं पीएम मोदी करते थे। अमेरिका की टेक और अन्य बड़ी कंपनियों के मालिकों के साथ विशेष बैठक किया करते थे। अब वही मोदी स्वदेशी का गुणगान कर रहे हैं।
वर्ष 2019 में हाउडी मोदी और 2020 के गुजरात में नमस्ते ट्रम्प कार्यक्रम का आयोजन हुआ था। यह सब आज भी वीडियो के रूप में सोशल मीडिया पर मौजूद है। इस सबके पीछे मोदी अपनी कूटनीति और विदेश नीति का गुणगान करते थे।
अमेरिका में भारतीय हितों को बरकरार रखने के लिए भारत सरकार की एक लॉबिंग कंपनी कार्यरत है जिसको हर वर्ष बड़ी रकम दी जाती है। अब मोदी-ट्रम्प के बीच टकराव हुआ तो एक अन्य लॉबिंग को हायर किया गया। इस लॉबिस्ट ने ट्रम्प से मुलाकात भी की और इसके बाद एक माह से रूकी हुई व्यापार वार्ता फिर से आरंभ हो गयी।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नरेन्द्र मोदी के जन्मोत्सव पर उन्हें फोन कर बधाई दी। इसके बाद मोदी समर्थक सोशल मीडिया पर ट्रम्प झुके आदि के अभियान आरंभ हो गये।
अब प्रधानमंत्री के सबसे नजदीकी मित्र डोनाल्ड ट्रम्प ने एच 1 बी वीजा का शुल्क बढ़ाकर 1 लाख डॉलर कर दिया। इससे पूरी दुनिया में हडकम्प मच गया।
अब याद कीजिये 2024 के अमेरिकी चुनाव के समय को। उन्होंने उसी समय अमेरिका फस्र्ट की नीति को प्रस्तुत किया था। इसके बाद जो कार्यक्रम घटित हुआ और एच 1 बी वीजा को लेकर विवाद सामने आया, उसकी जानकारी भारत सरकार की एजेंसियों को नहीं थी?
पीएम मोदी का अमेरिका जाना इस माह तय था। उन्होंने अपने कार्यक्रम को टाल दिया। अब यूएन में विदेश मंत्री भारत सरकार का पक्ष रखेंगे।
अगर मोदी अपने 56 ईंच के सीने के साथ अमेरिका जाते और राष्ट्रपति ट्रम्प से मुलाकात करते तो शायद संबंधों में आई खटास समाप्त हो जाती। लेकिन उन्होंने अपने अहम अर्थात अहंकार को प्राथमिकता दी और यूएसए का कार्यक्रम टाल दिया। अगले साल अमेरिका में ही जी-20 की बैठक होनी है, क्या पीएम उसका भी बहिष्कार करेंगे?
वहीं क्वाड की बैठक नवंबर माह में भारत में होनी है, क्या उस समय ट्रम्प आयेंगे?
जब मलाई खाने की बात आये तो भारत के प्रथम लोक सेवक खुद खा जायें और जब विदेश नीति/कूटनीति विफल हो जाये तो इसका ठीकरा किसी व्यक्ति विशेष पर फोडऩे का प्रयास किया जाये। यह कैसी जिम्मेदारी है।
असल में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे पत्रकार बोरिस जॉनसन के साथ इस तरह का व्यवहार मोदी कर चुके हैं और जी-7 बैठक में व्यक्तिगत रूप से जाने से इन्कार कर दिया था क्योंकि जॉनसन भी गणतंत्र दिवस पर भारत नहीं आये थे। उन्होंने सरकार का निमंत्रण ठुकरा दिया था।
Friday, September 19, 2025
व्यापारी नेताओं को अमेरिका ने कहा-नो एंट्री, चाबहार बंदरगाह पर लगेंगे प्रतिबंध
श्रीगंगानगर। रूसी तेल खरीद को लेकर अमेरिका-भारत के बीच तनाव बना हुआ है और यह हर दिन बढ़ता जा रहा है। भले ही भारत गणराज्य के शासक मोदी अपने जन्मदिन पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की बधाई को स्वीकार करते हुए दुनिया का वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हों।
टैक्स आतंकवाद पर चारों तरफ से मिल रही आलोचनाओं के बाद जीएसटी में बदलाव किया गया और टैक्स को कम किया गया। अपने ही टैक्स में परिवर्तन को भारत गणराज्य की सरकार ने वाहवाही लूटने का प्रयास किया। पांच साल से भी ज्यादा समय तक ज्यादा टैक्स वसूलने को अपनी गलती के रूप में स्वीकार नहीं किया।
वहीं अब जो बड़ी खबर आ रही है, उसमें बताया गया है कि अमेरिका ने भारत के व्यापारी नेताओं और कंपनियों के अधिकारियों का वीजा समाप्त कर दिया गया है और नये वीजा पर भी नो एंट्री कही जा रही है। अमेरिकन समाचार सेवा की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी है।
इससे पहले भारत गणतंत्र को पाकिस्तान के समकक्ष मानते हुए ड्रग तस्करी वाली सूची में डाल दिया। इसमें 23 देश शामिल है। अमेरिकी अधिकारियों ने सन फार्मा की गुजरात इकाई का निरीक्षण करते हुए उसे मापदण्डों के योग्य नहीं माना है।
भारत सरकार की नियामक सेबी ने गौतम अडाणी को क्लीन चिट दी तो खुशियां मनायी जा रही थीं किंतु ईरान के चाबहार बंदरगाह का संचालन करने वाली भारत सरकार के नजदीक अडाणी समूह की कंपनी पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है और संभवत: 29 सितंबर से यह लागू हो जायेगा।
भारत सरकार ने ईरान पर प्रतिबंधों के बीच चाबहार के विकास को लेकर समझौता किया था और अडाणी समूह ने 80 हजार करोड़ का निवेश करने का एलान किया। इस एलान को पूर्ण करने के लिए भारत से तत्काल एसबीआई के चेयरमैन को तेहरान बुलाया गया और वहीं पर लोन स्वीकृति जारी कर दी।
अमेरिका ने उस समय छूट प्रदान की हुई थी किंतु अब रूसी तेल की खरीद को लेकर संबंधों में खटास आयी तो चाबहार को दी गयी छूट को वापिस ले लिया गया है। इस तरह से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का 80 हजार करोड़ रुपये का ऋण पर भी संकट गहरा गया है।
भारतीय व्यापारी नेताओं के वीजा और उसके बाद नो एंट्री तथा कई अन्य प्रतिबंधों के बीच रुपया 88.30 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गया है।
हालांकि दोनों देश आपसी मतभेद दूर करने के लिए बैठकें कर रहे हैं, किंतु अभी कोई नतीजा नहीं निकला है और वाणिज्य मंत्री का मानना है कि नवंबर तक समझौता हो सकता है। इस बीच यह भी संभव है कि ट्रम्प प्रशासन द्वितीय प्रतिबंधों की घोषणा कर दे जो भारतीय उद्योगपतियों के लिए फायदे का सौदा नहीं हो।
प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल ही में यस बैंक द्वारा अनिल अम्बानी को दिया गया 50 हजार करोड़ का ऋण मामला भी गर्माया हुआ है।
विदेशी मीडिया का मानना है कि भारतीयों पर भारी-भरकम टैक्स लगाकर सरकार ने अपने नजदीकी मित्रों को बड़े-बड़े ऋण दिये।
Thursday, September 18, 2025
कंगाल पाकिस्तान को मिला महाशक्तियों का समर्थन!
श्रीगंगानगर। भारत गणराज्य के शासक नरेन्द्र मोदी 17 सितंबर को विश्वभर से जन्मदिन की मुबारकबाद मिलने से काफी उत्साहित नजर आ रहे थे। वहीं विश्व में एक ही रात में काफी कुछ बदल गया। कंगाल पाकिस्तान को अब सउदी अरब का साथ मिल गया है।
वैश्विक मंच तेजी से बदलता जा रहा है और भारत की विदेश नीति एक हारे हुए सैनिक की तरह की स्थिति में जी रही है।
जर्मन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन में पिछले कुछ दिनों के भीतर लाखों लोग एकत्र हो गये और सडक़ों पर उतर आये। वे अपने देश में इस्लामिक गतिविधियों के बढ़ावे से तंग आये हुए थे। वे आर्वजन नीति में बदलाव की मांग करते हुए नारे लगा रहे थे कि इस्लामी नागरिक उन देशों में चले जायें जहां शरीयत कानून लागू है। व्हाइट लोगों के देश को फिर से सुंदर बनाया जाये।
वैश्विक हालात को बदलते देखकर सउदी अरब ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ को फोन कर 17 सितंबर 2025 को रियाद बुला लिया। उनका गर्मजोशी से स्वागत की तस्वीरें प्रदर्शित की गयीं और दोनों देशों ने ‘इस्लामिक नाटो’ की शुरुआत कर दी। अब पाक और सउदी अरब ने एक समझौते में हस्ताक्षर किये हैं, जिसमें यह माना जायेगा कि एक देश पर हुए आक्रमण को दूसरे देश पर भी आक्रमण माना जायेगा।
यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि सउदी अरब दुनिया में सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है और उसके पास विदेशी मुद्रा और अमेरिकी हथियारों की कमी नहीं है।
बीबीसी ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि रियाद और इस्लामाबाद में जो समझौता हुआ है, वह भारत के लिए परेशानी का कारण बन सकता है।
सउदी की यमन से लगती सीमा की रक्षा की जिम्मेदारी पाक सैनिकों ने उठायी हुई है और बदले में पाकिस्तान को आसानी से कर्जा रियाद देता रहा है। पाकिस्तान ने अपने एटमी हथियार को इस्लामिक देशों की रक्षा का सूत्र बताया था। अब रियाद और इस्लामाबाद ने समझौते पर हस्ताक्षर कर उस झुमले को एक सरकारी दस्तावेज बना दिया है।
भारत की विदेश नीति फीकी हो रही है
विदेशी मीडिया की रिपोर्ट बता रही है कि भारतीय राजनीति अब अपने देश तक ही सीमित होकर रह गयी है। पश्चिम एशिया में पाकिस्तान ने अपनी स्थिति को मजबूत किया है। सउदी, कतर और अन्य अरब देश लगातार पाक सरकार के साथ सम्पर्क में हैं। इसी से मालूम हो जाता है कि विदेश नीति किस कदर कमजोर हो रही है।
इजरायल की एक गलती और बिगड़ गया संतुलन!
इजरायल ने कतर पर मिसाइल दागकर अमेरिका के लिए परेशानी का कारण बना दिया। कतर पर हमले को सउदी अरब ने गंभीरता से लिया और नाटो की तरह एक संगठन बनाने की तैयारी आरंभ कर दी। सबसे पहले परमाणु शक्ति सम्पन्न पाकिस्तान से सम्पर्क किया गया।
पीएम मोदी पुरस्कार लेकर ही खुश होते रहे
भारत गणराज्य के शासक नरेन्द्र मोदी अरब के देशों से सर्वोच्च पुरस्कार प्राप्त कर ही खुश होते रहे और एक ही झटके में सउदी अरब ने पूरे विश्व को बदलकर रख दिया। जब पीएम का जन्मदिन मनाया जा रहा था, उसी समय अरब ने रात को पाकिस्तान के साथ अबूझ समझौता कर लिया। अब अरब का धनशक्ति और पाक की परमाणु शक्ति मिल गयी हैं। इस तरह से दुनिया को एक चेतावनी दे दी गयी है।
वक्त बदल रहा था, पीएम समझ नहीं पाये
2025 के अगस्त माह की 22 तारीख को पीएम मोदी सउदी अरब की यात्रा पर थे और उसी दिन पहलगाम में आतंकवादी हमला हो गया। यह खबर सुनते ही मोदी वहां से रवाना हो गये। मेजबान का भोजन भी ग्रहण नहीं किया। इसके बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प व पीएम के बीच गर्मागर्म बहस हो गयी। अमेरिका की विदेश नीति ने पाकिस्तान को प्राथमिकता पर ले लिया। उसके सेनाध्यक्ष को दो बार व्हाइट हाउस में भोज दिया गया। यह बदलते हालात का एक प्रमाण थे।
जुलाई के बाद फिर यूके पहुंचे ट्रम्प
अभी हाल ही में जुलाई माह की 26 तारीख को राष्ट्रपति ट्रम्प यूके का दौरा करके आये थे और दो माह भी नहीं बीते कि वे फिर ये यूनाइटेड किंगडम में हैं। ब्रिटिश किंग चाल्र्स तृतीय ने सदियों पुराने अपने निवास पर उनका भव्य स्वागत किया। ट्रम्प को 17 सितंबर 2025 को ही शाही सम्मान दिया गया। उनको सोने की पारंपरिक ब्रिटिश बग्गी में यात्रा करवायी गयी। रॉयल फैमिली के सैनिकों ने उन्हें गॉर्ड ऑफ ऑनर दिया। प्रथम महिला मेलनिया ट्रम्प भी उनके साथ थीं। गुरुवार को 18 सितंबर को प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के साथ उनके सरकारी निवास पर वार्ता की और प्रेस कॉन्फ्रेंस का भी आयोजन किया गया। यहां उन्होंने पत्रकारों के सवालों का जवाब दिया।
ब्रिटेन के राजशाही इतिहास में इस तरह का सम्मान किसी भी राष्ट्राध्यक्ष को नहीं मिल पाया था। ट्रम्प ने इसे विश्व के दो प्रमुख केन्द्रों के मजबूत संबंधों का हवाला दिया।
फ्रांस के राष्ट्रपति मुश्किलों में
यूरोप के प्रमुख देश फ्रांस की राजनीति में काफी उथल पुथल मची हुई है। दो सालों के भीतर 5 प्रधानमंत्री बन चुके हैं और मौजूदा पीएम भी हालात को नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं। वे बजट की तैयारियां कर रहे हैं किंतु उनका मानना है कि फ्रांस के अमीर लोगों पर अतिरिक्त टैक्स लगाये जाने से ही आर्थिक हालात को सुधारा जा सकता है।
यूरोपीय देशों में चल रहे बड़े आंदोलन और इस्लामिक देशों की एकता से यह साफ दिखाई दे रहा है कि विश्व की राजनीति तेजी से बदल रही है। भारत के शासक नरेन्द्र मोदी का एक हैं तो सेफ हैं, का नारा भी कमजोर होता जा रहा है। वहीं भारतीय नागरिकों पर थोपा गया जीएसटी में सुधार को भी शासक मोदी अपनी सफलता मान रहे हैं। उन्होंने यह कभी स्वीकार नहीं किया कि दो लाख करोड़ की जो सहायता जीएसटी में बदलाव से मिली है, उस जीएसटी से जुटाये गये पैसों का कहां उपयोग किया गया।
एस जयशंकर कहां गये?
विदेश नीति को लेकर भारत सरकार की जय-जयकार हो रही थी और कुछ एनजीओ भी वही दिखा रहे थे जो सरकार चाह रही थी। चीन में शंघाई सहयोग संगठन में मोदी ने अपने कूटनीति को बड़ी सफलता बताया था। उनके दिल्ली लौटने के बाद रूसी राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन ने पाकिस्तान को अपना गहरा दोस्त बता दिया। उनको पारंपरिक सहयोगी देश बताया। रूस, चीन के नेताओं के साथ वार्ता और सेना प्रमुख की अमेरिका यात्रा तथा अब सउदी अरब का समझौता भारत सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने का मौका दे रहा है।
Sunday, September 14, 2025
युवाओं के जोश से हिला हुआ यूरोप
न्यूयार्क। अमेरिका में दक्षिण पंथी विचारधारा के नेता, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के मित्र चार्ली क्रिक की गोली मारकर हत्या के बाद यूरोप में भारी प्रदर्शन हो रहे हैं।
दक्षिणपंथी समूह यूरोप को आतंकवाद और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए आंदोलन कर रहा है। एक या दो देश नहीं बल्कि हर मुल्क में प्रदर्शन हो रहे हैं।
ब्रिटेन में सरकार भले ही मान रही हो कि शनिवार को प्रदर्शनकारियों की संख्या 1 लाख 10 हजार थी किंतु आयोजक मान रहे हैं कि 10 लाख या इससे भी कहीं ज्यादा लोग आतंकवाद, आर्वजन और अभिव्यक्ति की आजादी को सुरक्षित करने के लिए आंदोलनरत थे।
इसके अतिरिक्त यूरोप के अन्य देशों पौलेण्ड, जर्मनी, फ्रांस में भी प्रदर्शनकारियों को सडक़ों पर देखा गया। न्यूजीलैण्ड में भी इसी तरह का प्रदर्शन हुआ। सरकार हैरान हैं कि इतनी बड़ी संख्या में लोग सडक़ों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, उनको कैसे संभाला जाये। ब्रिटेन में तो पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच एक झड़प होने की भी जानकारी सामने आयी है।
नेपाल, बांग्लादेश में तो आंदोलनकारी युवाओं ने सत्ता को ही बदल दिया। अब यूरोप में रूढ़ीवादी एकजुट हो रहे हैं और अपनी मांगों पर कार्यवाही के लिए सरकार पर दबाव बना रहे हैं।
क्या वल्र्ड वॉर की तरफ बढ़ रही है दुनिया?
वाशिंगटन डीसी। व्हाइट हाउस ने रक्षा विभाग का नाम बदलकर उसको युद्ध निदेशालय का नाम दे दिया है। भले ही यह दो लाइन का समाचार लग रहा हो लेकिन यह वल्र्ड वॉर-3 की ओर संकेत दे रहा है?
भारत गणराज्य की सरकार ने दो लाख करोड़ रुपये का एक रक्षा सौदा करने की तैयारी कर ली है और यह इतिहास में सबसे बड़ा सौदा होगा।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प मंगलवार को दूसरी राजकीय यात्रा पर इंग्लैण्ड जा रहे हैं। मात्र 6 माह के कार्यकाल में वे दूसरी बार लंदन में प्रधानमंत्री और राजशाही अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्र्टारमर भी वाशिंगटन डीसी में स्थित ओवल कार्यालय में ट्रम्प से मिल चुके हैं।
कम समय के भीतर तीन बार मुलाकात हो चुकी है। हालांकि पिछली बैठक में व्यापार सौदा होने की जानकारी दी गयी थी। ट्रम्प ने इसके बाद ब्रिटेन पर टैरिफ कम कर दिया था।
यूरोप के नेताओं के साथ हाल ही में व्हाइट हाउस में भी राष्ट्रपति मिले थे, इनमें इटली और फ्रांस के राष्ट्राध्यक्ष शामिल थे। शिखर बैठक के बाद अब एक और शिखर बैठक हो रही है।
ब्रिटेन-संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों दुनिया की शक्ति का केन्द्र हैं। दोनों देश संयुक्त राष्ट्र में वीटो पॉवर रखते हैं। ब्रिटिश पौंड का मूल्य सर्वाधिक है।
माना जा रहा है कि रूस-युक्रेन युद्ध को लेकर बड़ी बात हो सकती है। इस समय युद्ध सबसे बड़ी चुनौति बना हुआ है। हालांकि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मणिपुर की यात्रा को पूर्ण कर लिया है लेकिन अभी भी माना जा रहा है कि रूस-युक्रेन युद्ध मोदी का युद्ध है और उन्हें ही समाप्त करवाना चाहिये।
दूसरी ओर देखते हैं तो चीन-रूस एक दूसरे के ज्यादा नजदीक आ रहे हैं। दोनों देश चाहते हैं कि यूएस डॉलर के मुकाबले नयी मुद्रा लायी जाये लेकिन पश्चिमी यूरोप, यूएस के लोगों की जितनी क्रय शक्ति है, शायद उतनी अन्य देशों में नहीं है। इसी क्रय शक्ति को अब पश्चिमी देश आगे की रेखाएं तैयार कर रहे हैं।
इस कारण चर्चा हो रही है कि वल्र्ड वॉर 3 की तरफ दुनिया नहीं बढ़ रही?
Friday, September 12, 2025
डेलाइट : संगरिया में गोली मारकर हत्या, पड़ोसियों को नहीं सुनाई दी गोलियों की आवाज
श्रीगंगानगर। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के संगरिया में गोली मारकर एक व्यक्ति की हत्या कर दी गयी। बाइक पर आये हमलावर वारदात को अंजाम देने के बाद उसी सफाई से निकल गये, जो वह योजना बनाकर आये थे। बाइक को क्लॉज सर्किट कैमरों ने कैद कर लिया है और उसके आधार पर जांच को आगे बढ़ाया जा रहा है।
पुलिस अधीक्षक हरिशंकर यादव ने बताया कि धानमंडी के नजदीक एक एनसीडैक्स की दुकान में अज्ञात हमलावरों ने मुनीम विकास को गोली मार दी। यह दुकान बालाजी इंटरप्राइजेज के नाम से संचालित हो रही है।
विकास जैन संगरिया के ही वार्ड नं. 30 का रहने वाला था और एनसीडैक्स की दुकान पर कार्य करता था।
वहीं अन्य सूत्रों ने बताया कि दुकान किसी नारंग नामक व्यक्ति की है। हमलावर प्रशिक्षित थे, क्योंकि उन्होंने कोई भगदड़ नहीं मचाई और बाइक पर दुकान के सामने एक युवक ने उतरकर प्रवेश किया और इसके बाद गोलियां चलाई दी। यह वारदात करीबन 11 बजे के आसपास की है।
वहीं इसकी पब्लिक को जानकारी करीबन 2 बजे किसी ने दी। पुलिस के लिए यह खास बिंदू है क्योंकि संभव है वारदात के लिए सुपारी दी गयी हो। हमलावरों का टारगेट विकास की हत्या करना ही था। वे पूरी साजिश को रचकर आये थे और वारदात को अंजाम देने के बाद शांति से निकल गये। इस दुकान के आसपास कबाडिय़ों की दुकानें भी हैं किंतु किसी ने गोली चलने या सहायता की पुकार को नहीं सुना।
एसपी यादव बताते हैं कि हमलावर दो थे और सीसी कैमरों में कैप्चर हो चुके हैं। वारदात किसी कारण से अंजाम दी गयी, उसका उद्देश्य क्या था, यह हमलावरों की पकड़ में आने के बाद ही पता चल पायेगा।
इस वारदात से इलाके में सनसनी फैल गयी है क्योंकि नई धानमंडी और गुरुद्वारा साहिब के नजदीक होने के बावजूद हमलावरों ने डेलाइट में वारदात को अंजाम दिया।
मोदी वैश्विक ब्रांडिंग के लिए मॉरिशस को 680 मिलियन डॉलर देंगे, नाम दिया गया प्रमुख सहयोगी देश
श्रीगंगानगर। पंजाब, बिहार, हिमाचल आदि उत्तर भारत के राज्यों में बाढ़ से भारी नुकसान हुआ है। पंजाब में इतना विकराल रूप बाढ़ का था कि करीबन 200 गांव में आज भी पानी भरा हुआ है और फसलें चौपट हो गयी हैं।
वहीं पंजाब का दौरा करने के उपरांत केन्द्र सरकार ने 16 सौ करोड़ रुपये की सहायता जारी की है, जबकि आवश्यकता हजारों करोड़ रुपये की है। बिहार, उत्तर प्रदेश ने तो बाढ़ के प्रतिवर्ष आने को अपनी नियति मान लिया है लेकिन पंजाब में 1988 के बाद बाढ़ आयी है जिसका सामना करने के लिए किसान तैयार ही नहीं थे।
बाढ़ से मरने वालों को सिर्फ दो-दो लाख रुपये मुआवजा दिये जाने की जानकारी दी गयी।
पंजाब में यह सीजन चावल की सिंचाई करने का होता है और इसी से ही पंजाब की आर्थिक ताकत मजबूत होती है। बासमती राइस ही राज्य की प्रमुख आर्थिक ढाल है क्योंकि उद्योग क्षेत्र तो पहले से ही कमजोर होता जा रहा है।
मॉरिशस को 680 मिलियन डॉलर की सहायता दी जा रही है्र जो आश्चर्यजनक है। मॉरिशस में इन पैसों से अस्पताल, समुन्द्री सीमा की सुरक्षा को मजबूत करेगा। मॉरिशस के हाल ही में राष्ट्रीय कार्यक्रम में पीएम मोदी मुख्यातिथि थे और इसके बाद वे जी-7 सम्मेलन में भाग लेने के लिए कनाडा गये थे।
क्या भारत का युवा, मजदूर, महिला, आदिवासी इतना मजबूत हो चुका है कि देश दूसरों की मदद के लिए हजारों करोड़ का सहायता/लोन दे सके।
पंजाब में पहले ही बेरोजगारी का सामना करते हुए युवा विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं। अब वहां पर बाढ़ ने आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर दिया है।
हम चंद्रयान, गगनयान, मंगलयान आदि पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं जबकि सरकारी भवनों की इमारत 100 साल को पूरा कर चुकी हैं या करने वाली हैं। अब यह इमारतें जर्जर हो चुकी है। राजस्थान के गांव में सरकारी स्कूल की छत गिरने से 7 बच्चों की मौत हो गयी थी।
यह वो तथ्य हैं, जिनके बारे में सोचे जाने की आवश्यकता है और जर्जर भवनों का नवनिर्माण आवश्यक हो गया है।
अगर पंजाब के एक एनजीओ की खबरों पर यकीन किया जाये तो सामने आता है कि पंजाब में 2 लाख हैक्टेयर जमीन पर फसल बर्बाद हो गयी और हजारों मकान टूट गये हैं। पानी निकासी के बाद निकलने वाली धूप कितने हजार लोगों को और प्रभावित करेगी, यह भी चिंता का विषय है।
इस बीच यह खबरें आना कि भारत दूसरे देशों को सहयोग दे रहा है। इससे साफ होता है कि मोदी अपनी वैश्विक ब्रांडिंग के लिए न जाने कितना कुछ करने वाले हैं।
हुस्नी मुबारक के बाद दक्षिण एशिया सत्ता पलटने का केन्द्र बना
न्यूयार्क। विश्व में इस समय जो चर्चा हो रही है, वह नेपाल के युवाओं की है। जेन-जैड के नाम से युवा आंदोलन कर रहे हैं और संसद, प्रधानमंत्री आवास आदि को आग लगाकर धराशायी कर दिया है।
वर्ष 2011 का वक्त याद करना होगा जब हुस्नी मुबारक को 30 साल सत्ता में रहने के बाद आंदोलन हुआ था और लोगों ने मुबारक को गैर मुबारक करते हुए हटा दिया था। यह देश में सत्ता परिवर्तन का पिछले कुछ सालों का सबसे बड़ा चर्चा का केन्द्र था। जब लोकतंत्र की आवाज उठाने वाले युवा हों तो वे कुछ भी कर गुजरते हैं।
इसी तरह से दक्षिण एशियाई श्रीलंका में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को निशाना बनाकर आंदोलन किया गया। यहां भी सत्ता पलट गयी और पहली बार देश वामपंथी ताकतों के हाथों में चला गया। ध्यान देना होगा कि उस समय अमेरिका में भी वामपंथी विचारधारा वाली सरकार थी।
अभी श्रीलंका में राजनीति में पूरे जमाए ही नहीं थे कि एक और दक्षेस देश बांग्लादेश में युवा सडक़ों पर निकल पड़े। सत्ता परिवर्तन की लहर आरंभ हुई और कई सालों से शासन कर रही शेख हसीना को भारत में शरण लेनी पड़ी।
अब नेपाल में जो रहा है, वह भी युवा शक्ति के एकजुट होने के बाद हो रहा है।
युवा अभी तक किसी एक नाम पर सहमत नहीं हैं, लेकिन वे राजशाही के पक्ष में हैं। राजशाही के समय नेपाल दुनिया का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र था। चीन मजबूत हुआ तो वहां पर लोकतंत्र की आवाज के नाम पर आंदोलन किया गया और राजशाही को समाप्त कर दिया गया। नेपाल को सर्वसमाज का नाम दे दिया गया।
लोकतंत्र की हालत यह रही कि चीन-भारत की विदेश नीतियां इस देश पर हावी हो गयी और दोनों देश अपने-अपने प्रधानमंत्री बनाने के लिए जुटे रहे और हालात यह रही कि कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। चेहरे बदलते रहे लेकिन सिस्टम वही रहा।
नेपाल भारत पर निर्भर रहा है। पेट्रोलियम और अन्य पदार्थ भारत से ही निर्यात होते रहे हैं। भारत-नेपाल के बीच पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं थी और सदियों से गौतम बुद्ध के देश के साथ भारत का नाता रहा।
लाखों लोग नेपाल से भारत आकर अपना रोजगार चला रहे हैं। भारत से भी पशुपतिनाथ मंदिर के लिए लोग काठमांडू की यात्रा करते रहे हैं
अब उसी नेपाल में युवा शक्ति एक बार पुन: राजतंत्र की स्थापना की मांग कर रही है। दक्षिण एशिया में पिछले कुछ माह के भीतर ही तीन देशों में सत्ता को युवाओं के प्रदर्शन ने बदल दिया।
Sunday, September 7, 2025
क्या ट्रम्प युद्ध की तैयारी कर रहे हैं?
वाशिंगटन। याद कीजिये वर्ष 2014-2019 का दौर जब भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काले धन वापिस लाने के नाम पर देश की जनता को ‘काम’ पर लगा दिया था। पहले शैल कंपनियों पर स्ट्राइक, फिर नोटबंदी और इसके बाद जीएसटी के लिए लोग अपने सुख-दुख भूलकर लाइनों में लगे हुए थे।
21 जनवरी 2025 को अमेरिका में व्हाइट हाउस का प्रशासन बदल गया। नये राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वापसी करते हुए ऐसे कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किये कि भारत, यूरोप, चाइना सहित सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष अब काम पर लगे हुए हैं। पहले जनता को बिजी किया जाता था और अब व्हाइट हाउस ने दुनिया भर के नेताओं को ‘काम’ पर लगाया हुआ है।
रूस, अमेरिका और यूरोप आदि के सभी नेता बयान दे रहे हैं कि गाजा और यूक्रेन-रूस युद्ध की शांति का मार्ग दिल्ली से होकर गुजरता है और प्रधानमंत्री मोदी को अपना कार्य करना चाहिये।
उधर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प ने वोटिंग के समय वादा किया था, ‘अमेरिका फस्र्ट’। इस नारे को पूरा करने के लिए वे 6 माह के भीतर 200 कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।
उन्होंने शिक्षा विभाग को समाप्त किया। कभी स्टेट्स सिम्बल माने जाने वाली हावर्ड यूनिवर्सिटी को दिये जाने वाले सरकारी अनुदान को समाप्त किया और एक जांच कमेटी भी बैठायी जो विदेश अनुदान के संबंध में जांच कर रही है। इस तरह से उन्होंने दिखाया कि यह विश्वविद्यालय डेमोक्रेट्स पार्टी की विचारधारा वाले लोगों को दुनिया के सामने आर्थिक, सामाजिक ज्ञाता के रूप में प्रस्तुत करती है।
अमेरिका में इन दिनों जो चर्चा हो रही है, वह राजधानी वाशिंगटन डीसी में क्राइम कंट्रोल के लिए सेना को नियुक्त करना। इससे अनेक अपराधी पकड़ में आये और आधुनिक हथियार भी बरामद हो गये। पिछले 10 दिनों में एक भी व्यक्ति की हत्या नहीं हुई।
ट्रम्प ने अपने विचारों को आगे बढ़ाते हुए रक्षा मंत्रालय का नाम बदल दिया। अब इसका नाम ‘युद्ध मंत्रालय’ कर दिया गया। उन्होंने कहा कि वे रक्षा नहीं आक्रमण की स्थिति में पहुंच रहे हैं और इसलिए नाम बदला गया है। पेंटागन का नाम भी बदलने का निर्णय वे कर चुके हैं।
उनके इस कदम से यह देखा जा सकता है कि वे डिफेंस नहीं बल्कि फ्रंटफुट पर खेलना चाहते हैं।
वहीं वेनेजुएला को उन्होंने चारों तरफ से घेर रखा है। इस तरह से यह आशंका पैदा हो गयी है कि वे वेनेजुएला पर आक्रमण करने वाले हैं?
वेनेजुएला में रशिया की भी सेना है। पहले यह देश सुंदर महिलाओं की ताजपोशी के लिए जाना जाता था अब इस पर ड्रग व्यापार आदि के आरोप लग रहे हैं और अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं।
जापान के प्रधानमंत्री का भी इस्तीफा
ट्रम्प के व्हाइट हाउस में आने के बाद अनेक देशों की अर्थव्यवस्स्था प्रभावित हो रही है। भारतीय रुपये के यूएस डॅालर के मुकाबले भाव कम हो रहे हैं और 88 रुपये को भी पार कर गया।
फ्रांस में हाल ही में चुनाव हुए थे किंतु सरकार फिर से अल्पमत में आ गयी है और नये सिरे से चुनाव की मांग उठ रही है।
जापान के प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा ने भी इस्तीफा दे दिया। वे अपनी पार्टी का विश्वास खो चुके थे। इससे पहले कनाडा के पीएम जस्ट्नि ट्रूडो इस्तीफा दे चुके थे। जर्मन में भी नये सिरे से चुनाव हुए। जापान के साथ ट्रम्प ने दोस्ती का परिचय देने की कोशिश की थी और टैरिफ को 25 से कम कर 15 प्रतिशत कर दिया था।
उन्होंने रक्षा मंत्रालय का नाम बदला है तो इसके बाद भी दुनिया भर में राजनीति तेज हो गयी है।
Friday, September 5, 2025
पाकिस्तान किसकी गोद में बैठा है?
न्यूयार्क। चाइना में भारत, रूस, चीन, पाकिस्तान, उत्तरी कोरिया आदि के अनेक नेता शंघाई सहयोग सम्मेलन में एकत्रित हुए। इसको अमेरिका के खिलाफ एक नये संगठन के तौर पर देखा गया। भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दिल्ली वापिस आये तो रूस-पाकिस्तान के बीच शिखर वार्ता हो गयी। इससे यह सवाल उठ रहा है कि आखिर पाकिस्तान किसकी गोद में जाकर बैठ गया है?
शंघाई सहयोग सम्मेलन में उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन को भी आमंत्रित किया गया। वहीं सबकी निगाहें पाकिस्तान पर लगी हुईं थी क्योंकि पिछले कुछ दिनों के भीतर ही सेना प्रमुख आसिफ मुनीर अमेरिका का दो बार चक्कर काटकर आये थे। व्हाइट हाउस में रेड कारपेट पर उनका स्वागत किया गया था, अब वही जनरल मुनीर चाइना में भी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के साथ थे।
सम्मेलन से पूर्व जो राजनीति का खेला हुआ, उसको भी सबको जानने का अधिकार है, लेकिन इस पर विस्तृत से चित्रण नहीं हो पाया था। बीजिंग से विदेश मंत्री योंग वी नई दिल्ली आये। अनेक नेताओं से मुलाकात के बाद वे पाकिस्तान चले गये और वहां पीएम शाहबाज शरीफ सहित अन्य नेताओं से मुलाकात की।
इस दौरान ही भारत गणराज्य के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री ने रूस की अलग-अलग यात्रा की।
रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन की भारत यात्रा प्रस्तावित है लेकिन वे पिछले साल भी नहीं आये और इस साल भी अभी तक यह पक्का नहीं है।
प्रधानमंत्री मोदी शिखर सम्मेलन में शामिल होने के बाद भारत लौट आये तो इसके उपरांत रूस और पाकिस्तान के बीच शिखर वार्ता हुई। यह वार्ता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तीन सालों से चल रहे रूस-युक्रेन युद्ध की संघर्ष समाप्ति की रेखा दिल्ली से होकर गुजरती है, अमेरिका सरकार और यूरोप का यही मानना है।
करीबन एक से डेढ़ वर्ष के बीच में प्रधानमंत्री मोदी चौथी बार अमेरिका जा रहे हैं। वे संयुक्त राष्ट्र संघ की सालाना बैठक को संबोधित करेंगे। उनकी मुलाकात व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रम्प के साथ होगी या नहीं, यह अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।
पाकिस्तान सेना के प्रमुख तो दो बार अमेरिका में व्हाइट हाउस जाकर राष्ट्रपति ट्रम्प से मुलाकात कर चुके हैं। इसके उपरांत ही उनको जनरल अयूब खां के बाद पाकिस्तान के फील्ड मार्शल की उपाधि दी गयी।
इसी कारण सवाल उठ रहा है कि आखिर पाकिस्तान किसके साथ है। चाइना ने पाक में अपने निवेश के प्रोजेक्ट को बंद करने का निर्णय लिया है।
राजनीति की दूसरी तस्वीर भी सामने आ रही है, वाशिंगटन डीसी से चीन के लिए एक संदेश दिया गया। चाइना के 6 लाख युवाओं को अमेरिकी स्टडी वीजा दिया जायेगा।
ट्रम्प ने अमेरिकी समयानुसार (चार सितंबर 2025) गुरुवार को कहा कि वे पुतिन से पहले मुलाकात कर चुके हैं और अब वे फिर से उनसे वार्ता करेंगे। पुतिन ने ट्रम्प को क्रेमलिन की यात्रा करने का निमंत्रण दिया है जिसके औपचारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया गया है। दोनों शिखर नेताओं के बीच दूसरी बार वार्ता मास्को में ही होने की उम्मीद जतायी गयी है।
पश्चिमी देश भी चाहते हैं कि नई दिल्ली पूर्वी यूरोप में चल रहे संघर्ष को समाप्त करने के लिए अपनी भूमिका निभाये।
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