Thursday, September 25, 2025

 

वाशिंगटन जैसी सुपर परचेज पॉवर दुनिया में शायद नहीं है?



वाशिंगटन। रूस-युक्रेन युद्ध को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस तरह से डे-फस्र्ट से गतिशील थे, अब उस तरह से नहीं है, क्योंकि उनकी रूस के साथ चल रही बातचीत के बाद भी सार्थक परिणाम सामने नहीं आये हैं, हालांकि दोनों देश विदेश मंत्री स्तर पर वार्ताओं का दौर चलाये हुए हैं। 

पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि वे युद्ध को समाप्त करवायें। प्रशासन बदला तो ट्रम्प ने भी पीएम को वाशिंगटन डीसी बुलाकर यही बात दोहराई। इसके बाद वे अपने स्तर पर भी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के साथ अनेक बार वार्ता कर चुके हैं। 

पुतिन ने शांति वार्ता के लिए विश्व के सामने कुछ शर्तें रखी हुई हैं और उनकी पालना करवाने के बाद ही वे युद्ध को समाप्त कर सकते हैं। 

इन सबके बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, लेकिन मोदी को भी देश के भीतर विरोधी दलों से सामना करना पड़ रहा है और तीन बड़े राज्यों बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडू में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन तीन राज्यों के माध्यम से ही राज्यसभा में भी पकड़ बनाये रखी जा सकती है। 

भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी मोदी को आलोचनाओं और पहली बार विरोधी गुट को भी संभालने की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है और वे रूस-युक्रेन के लिए उतना समय नहीं निकाल पा रहे हैं कि उसको समाप्त करवाया जा सके। कुछ दिन पूर्व ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री मास्को की यात्रा कर उनको भारत आने का निमंत्रण देकर आये थे और दावा किया गया था कि पुतिन नई दिल्ली में होने वाले वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए नवंबर माह में आयेंगे। 

जीएसटी-2.0 मोदी को बिहार जीता पायेगा

अब हमें फ्लैश बैक में जाते हुए 2024 का 15 अगस्त का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण सुनना होगा। उन्होंने उस दिन कहा था कि जिनका लिया है, उनको लौटाया जायेगा। इसका विस्तार से उल्लेख उन्होंने एक साल तक नहीं किया किंतु इस साल 15 अगस्त के बाद जीएसटी-2.0 लेकर आ गये। इसको एक्ट में संशोधन कहा गया और इसका अब प्रचार भी हो रहा है। प्रत्येक दिन खाने-पीने की जिन चीजों का गरीब से लेकर अमीर तक खरीद कर अपना पेट भरते हैं, उन पर टैक्स कम किया गया। कारों को भी सस्ती किया गया क्योंकि ट्रम्प प्रशासन ऑटो और स्टील पर 25 प्रतिशत टैक्स लगा चुके थे और इसके बाद 50 प्रतिशत कर दिया गया। भारत से कारों का निर्यात यूएसए में भी होता है। जिन वस्तुओं को उन्होंने ही महंगा किया था, खुद ही सस्ता किया और फिर उसको अपनी उपलब्धि भी बताया गया। 

अपरोक्ष टैक्स परोक्ष टैक्स से कहीं ज्यादा वसूला गया। देश में सेविंग कम हो गयी और जो धन घरों में जमा था वह पहले बैंक और फिर दिल्ली पहुंच गया। वहां से मित्रों तक भी पहुंचा। हालात यह हो गये कि बैंकों के पास भी कैश का प्रवाह कम हो गया। यह बात वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी मीडिया के सामने कबूल की और एक वक्तव्य जारी किया। 


पेट्रोलियम, टोल टैक्स और बैंकिंग!

जीएसटी रिफार्म के आधार पर सरकार प्रचार कर रही है लेकिन अभी यह भी देखने वाला है कि अन्य क्षेत्रों में जो लूटा जा रहा है, उसको कैसे कम किया जायेगा। 

टोल टैक्स 2 रुपये प्रति किमी या इससे भी कहीं ज्यादा वसूला जा रहा है। 

अगर इसको बेहतर तरीके से समझना हो तो हमें व्यवहारिक रूप से लुधियाना-जालंधर हाइवे पर यात्रा करनी होगी। फगवाड़ा के निकट एक पुल को क्रॉस करने के लिए 350 रुपये वन साइड टैक्स लिया जा रहा है। इसको टोल आतंकवाद के रूप में भी कहा जा सकता है। इस रास्ते पर 25 घंटे में आवागमन करने पर 700 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। 24 घंटे में 525 रुपये खर्च हो जाते हैं। 

पारदर्शिता के नाम पर इसको ऑनलाइन वसूला जा रहा है, लेकिन ध्यान देना होगा कि यह टोल एक-दो साल से नहीं बल्कि दशकों से वसूला जा रहा है और हर दिन सैकड़ों वाहन आवागमन करते हैं। कुछ समय पहले तक यह वन साइड 100 रुपये का था। फिर कुछ अंतराल के बाद टैक्स को बढ़ाया गया और अब इसको 350 रुपये तक वन साइड कर दिया गया है। 

क्या सोचना नहीं चाहिये कि एक टोल प्लाजा देश की आर्थिक स्थिति को बेहतर कर रहा है जैसा कि पीएम ने बांसवाड़ा में कहा कि हालात बेहतर होने पर जीएसटी को और कम किया जायेगा। आदिवासी क्षेत्र में उनका भाषण स्वादिष्ट होगा लेकिन यह बिहार-बंगाल चुनाव और अंतरराष्ट्रीय दबाव का हिस्सा है। 

पेट्रोलियम क्षेत्र में भी बड़े-बड़े उद्योगपति सक्रिय हैं और इस तरह से उनकी कंपनियों को भी सीधा लाभ पहुंचाने के लिए पेट्रोल पर भी टैक्स आतंकवाद का असर दिखाई देता है। भूटान में पेट्रोल 75 रुपये और भारत में लगभग 100 रुपये। एक लीटर के 25 रुपये तक अंतर है। भूटान भारत से ही सभी प्रकार का पेट्रोल आयात करता है। 

वर्ष 2014 से लेकर अब तक बैंकिंग सैक्टर में भी 80 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खाताधारकों के पैसे इसलिए काट लिये गये क्योंकि उनके पास बचत या चालू खाता में सरकार के नियमों के अनुसार राशि जमा करवाने के लिए पैसे नहीं थे। कुछ बैंकों ने अब सरकार के निर्देशों के बाद बचत खाता में बैलेंस के नाम पर शुल्क लेना बंद कर दिया गया है किंतु चालू खातों में अभी भी है जबकि पीएम एमएसएमई का राग अलाप रहे हैं। 

एमएसएमई का अर्थ छोटे, मध्यम व्यवसाय हैं। इस सैक्टर को कोराना राहत देने के लिए 20 लाख करोड़ रुपये 2020 में रखे गये थे किंतु इस दौरान सरकार ने एमएसएमई के टर्नओवर को भी काफी बढ़ा दिया ताकि इससे उनके मित्रों को भी लोन दिया जा सके और उनकी कंपनियां इसमें लाभ लेने में सफल भी रहीं। बाकी तो बैंकों के चक्कर ही काटते रह गये। 

सरकार जनता के सामने मीडिया के माध्यम से पारदर्शिता के नाम पर बदलाव की जानकारी देती है, लेकिन उनके फलसफा का इन्द्राज आम जनता नही कर पाती है और हालात यह हो रही है कि बैंक भी खाली हो रखे हैं। इन बैंकों को हाउसिंग या ऑटो लोन ने खाली नहीं किया है बल्कि जो हजारों करोड़ रुपये के एक-एक ऋण दिये गये, उसका परिणाम है। 


विदेश नीति की हार 

रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन भारत आने के लिए तैयार नहीं है। अमेरिका के साथ संबंधों को खराब कर लिया गया। पहले पीएम मोदी ने स्वयं अमेरिका जाने से इन्कार कर दिया और अब रुपया अस्थिर होकर 89 रुपये की ओर प्रति डालर बढ़ रहा है, उससे सरकार भी चिंतित नजर आने लगी है। स्टॉक मार्केट भी कमजोर हो रहा है क्योंकि विदेशी निवेशक अपनी धनराशि निकाल रहे हैं। 

विदेश मंत्री वाशिंगटन पहुंचे तो वहां पर संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो से भी मुलाकात करते हुए दोनों राष्ट्राध्यक्षों की मीटिंग के लिए चर्चा की गयी। 

वर्ष 2018 में आपदा में अवसर की तलाश का मंत्र देने वाले नरेन्द्र मोदी इस आपदा में अवसर तलाश नहीं पा रहे हैं।

रूस पर प्रतिबंधों के कारण स्विफ्ट से भारतीय धन जो वहां निवेश किया हुआ था अथवा लाभांश था, वह वापिस नहीं आ पा रहा है। अमेरिका के चर्चित ऑटोपेन भी इस मामले में कोई मदद नहीं कर पाया। 

इस आपदा में अवसर की तलाश करते हुए उन्होंने ब्रिक्स करंसी आरंभ करने में चीन-रूस का एक संयुक्त संगठन बनाने का प्रयास किया किंतु इस पर भी अभी तक पानी फिरा हुआ है। 

असल में अमेरिका में 32 करोड़ की आबादी में से 20 करोड़ ऐसे हैं, जिनकी क्रय शक्ति दुनिया में सबसे ज्यादा है। यूरोप, भारत, चीन,  इसका फायदा उठाते हैं और अब इतना बड़ा बाजार तलाश कर पाना तीनों ही देशों के लिए मुश्किल है। 

भारत का हजारों करोड़ का जो आइटी सैक्टर है, वह भी अमेरिका की मदद से ही चल पा रहा है। यूएसए में 70 प्रतिशत आईटी पेशेवर भारत से हैं। 20 प्रतिशत चाइनीज हैं और शेष 10 प्रतिशत अन्य क्षेत्रों से हैं। 

टाटा, अम्बानी, महिन्द्रा जैसे सभी बड़े उद्योगपतियों की अमेरिका में आईटी कंपनियां स्थापित हैं। इसके अतिरिक्त बेनामी सम्पत्तियां भी हैं। अनेक अधिकारियों का भी वहां पर निवेश है। अब सभी लोग राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर देख रहे हैं कि वे क्या निर्णय लेते हैं। 

ट्रम्प ने सउदी, यूरोपीय यूनियन, ब्रिटेन, साउथ कोरिया, जापान सहित कई अन्य देशों के साथ नई ट्रेड डील कर ली है। चीन, रशिया, भारत और कनाडा सहित कुछ अन्य देशों पर टैक्स अभी भी ज्यादा है। अमेरिकी मीडिया मानता है कि अगर ट्रम्प टैरिफ कम नहीं करते हैं तो इससे दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगना तय है। 

कनाडा ने मंदी को स्वीकार कर लिया है। भारत के लिए कहा जा रहा है कि जीडीपी कमजोर होगी। चीन अपनी रफ्तार पहले ही खो चुका है और अमेरिकी बाजार तक वह उसी तरह की अप्रोच नहीं रख पाता है तो इतनी बड़ी परचेज पावर वाला अन्य कंट्री नहीं मिल पायेगा। 






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