Friday, September 12, 2025

 

हुस्नी मुबारक के बाद दक्षिण एशिया सत्ता पलटने का केन्द्र बना


न्यूयार्क। विश्व में इस समय जो चर्चा हो रही है, वह नेपाल के युवाओं की है। जेन-जैड के नाम से युवा आंदोलन कर रहे हैं और संसद, प्रधानमंत्री आवास आदि को आग लगाकर धराशायी कर दिया है। 

वर्ष 2011 का वक्त याद करना होगा जब हुस्नी मुबारक को 30 साल सत्ता में रहने के बाद आंदोलन हुआ था और लोगों ने मुबारक को गैर मुबारक करते हुए हटा दिया था। यह देश में सत्ता परिवर्तन का पिछले कुछ सालों का सबसे बड़ा चर्चा का केन्द्र था। जब लोकतंत्र की आवाज उठाने वाले युवा हों तो वे कुछ भी कर गुजरते हैं। 

इसी तरह से दक्षिण एशियाई श्रीलंका में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को निशाना बनाकर आंदोलन किया गया। यहां भी सत्ता पलट गयी और पहली बार देश वामपंथी ताकतों के हाथों में चला गया। ध्यान देना होगा कि उस समय अमेरिका में भी वामपंथी विचारधारा वाली सरकार थी। 

अभी श्रीलंका में राजनीति में पूरे जमाए ही नहीं थे कि एक और दक्षेस देश बांग्लादेश में युवा सडक़ों पर निकल पड़े। सत्ता परिवर्तन की लहर आरंभ हुई और कई सालों से शासन कर रही शेख हसीना को भारत में शरण लेनी पड़ी। 

अब नेपाल में जो रहा है, वह भी युवा शक्ति के एकजुट होने के बाद हो रहा है। 

युवा अभी तक किसी एक नाम पर सहमत नहीं हैं, लेकिन वे राजशाही के पक्ष में हैं। राजशाही के समय नेपाल दुनिया का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र था। चीन मजबूत हुआ तो वहां पर लोकतंत्र की आवाज के नाम पर आंदोलन किया गया और राजशाही को समाप्त कर दिया गया। नेपाल को सर्वसमाज का नाम दे दिया गया। 

लोकतंत्र की हालत यह रही कि चीन-भारत की विदेश नीतियां इस देश पर हावी हो गयी और दोनों देश अपने-अपने प्रधानमंत्री बनाने के लिए जुटे रहे और हालात यह रही कि कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। चेहरे बदलते रहे लेकिन सिस्टम वही रहा। 

नेपाल भारत पर निर्भर रहा है। पेट्रोलियम और अन्य पदार्थ भारत से ही निर्यात होते रहे हैं। भारत-नेपाल के बीच पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं थी और सदियों से गौतम बुद्ध के देश के साथ भारत का नाता रहा। 

लाखों लोग नेपाल से भारत आकर अपना रोजगार चला रहे हैं। भारत से भी पशुपतिनाथ मंदिर के लिए लोग काठमांडू की यात्रा करते रहे हैं 

अब उसी नेपाल में युवा शक्ति एक बार पुन: राजतंत्र की स्थापना की मांग कर रही है। दक्षिण एशिया में पिछले कुछ माह के भीतर ही तीन देशों में सत्ता को युवाओं के प्रदर्शन ने बदल दिया। 







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