Tuesday, July 22, 2025
नैतिकता शब्द को जिंदा कर गये उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़
श्रीगंगानगर। भारत गणराज्य के उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ ने अपने पद से इस्तीफा देकर नैतिकता को एक बार पुन: जीवित कर दिया। राजनीति में नैतिकता कई सालों से गुम हो गयी थी। उनके इस्तीफा के उपरांत अनेक सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इतने बड़े पद से धनकड़ का मोह कैसे भंग हो गया।
कुछ माह पूर्व एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान धनकड़ ने शिवराज सिंह चौहान को संबोधित करते हुए सवाल किया था कि किसान आंदोलन पिछले साल भी चल रहा था, इस साल भी चल रहा है। इसका क्या कारण हैं? इस अशांत माहौल को शांत किया जाये।
उपराष्ट्रपति ने पिछले सप्ताह ही एक बार फिर सनसनी फैला दी थी कि देश में माहौल लोकतंत्र के लायक नहीं रहा है। यह चंद शब्द ने पूरी दुनिया का ध्यान उनकी ओर खींचा था। उन्होंने इस तरह का बयान देकर नरेन्द्र मोदी की सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया था। इस बीच ही गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रुपाणी की विमान हादसे में मौत हो गयी।
उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने 6 महीने के कार्यकाल पूरा होने पर जश्र मना रहे थे और इसके कुछ घंटों उपरांत ही समाचार आ गया कि उपराष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर आसीन जगदीप धनकड़ ने इस्तीफा दे दिया है।
अपने इस्तीफा में उन्होंने मोदी सरकार की तारीफ भी कर दी, जिसमें कहा गया कि भारत आर्थिक रूप से मजबूत हो रहा है। एक इस्तीफा में आर्थिक मजबूती का जिक्र करना अपने आप में ही सवाल पैदा करता है।
ध्यान देना होगा कि विजय रूपाणी और अन्य यात्री बोइंग एयर बस से इंग्लैण्ड जा रहे थे और दो इंजन वाला जहाज अचानक ही क्रैश हो गया। सरकारी जांच में लीपापोती कर पायलटों की लापरवाही पर सवाल उठाने की कोशिश की गयी किंतु जब पायलट यूनियन एक जुट होकर जांच पर ही सवाल उठाये तो अब अन्य कारण खोजे जा रहे हैं लेकिन हकीकत में यह सच नहीं आयेगा।
धनकड़ की तरह विजय रूपाणी भी नई दिल्ली से नाराज चल रहे थे। उनके पास महत्वपूर्ण दस्तावेज थे।
उपराष्ट्रपति के रूप में जगदीप धनकड़ ने स्वास्थ्य सेवाओं का हवाला दिया हो लेकिन इस देश ने डॉ. शंकर दयाल को राष्ट्रपति के रूप में देखा है जब उनको चलने में ही काफी दिक्कत आती थी और वे एक बुजुर्ग राष्ट्रपति थे।
धनकड़ को कहीं जाने-आने के लिए सहारे की आवश्यकता नहीं थी।
भारत गणतंत्र की मौजूदा सरकार में क्या चल रहा है, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। यह कुछ लोगों को चश्मे पहने होने के कारण दिखाई नहीं दे रहा हो लेकिन बदला बहुत कुछ है। सरकार जनता की कम होती आमदनी को नहीं दिखा रही बल्कि टैक्स को अपनी सफलता के रूप में प्रदर्शित कर रही है।
जीएसटी को पहले वैट के रूप में जाना जाता था और राज्य सरकार का हिस्सा सीधे राज्य सरकारों के खाते में जाता था। नयी टैक्स प्रणाली जीएसटी को लगाया तो वो टैक्स सीधे केन्द्र सरकार के खाते में जाता है और सरकार उस उपलब्धि का बखान करती है। अनेक राज्य तो अपने टैक्स का हिस्सा नहीं मिलने पर केन्द्र को बार-बार चि_ियां लिखते हैं।
सरकारी धन की निगरानी के लिए एक संवैधानिक संस्था बनी हुई है जिसका नाम कैग है। इस संस्था के नवंबर 2024 से पहले गिरीश चंद्र मूर्मू थे। मूर्मू गुजरात कैडर के आईएएस थे और गुजरात में सीएम नरेन्द्र मोदी के सलाहकार भी रह चुके थे और दिल्ली में गुजरात मॉडल लागू किया गया तो गिरीश को जम्मू-कश्मीर का उप राज्यपाल बनाया गया और फिर कैग का प्रमुख। वो रिटायर हुए तो शिक्षा विभाग के सचिव के संजय मूर्ति को यह जिम्मेदारी दी गयी।
देश के महत्वपूर्ण राज्य मणिपुर जो तीन सालों से अशांत माहौल में है, वहां की जिम्मेदारी भी गृह मंत्रालय से रिटायर हुए अधिकारी के हाथों में दे दी गयी। अजय भल्ला को दो बार एक्सटेंशन दिया गया।
इस तरह से अपने नजदीकी आईएएस अधिकारियों को संवैधानिक पद सौंप दिये गये हैं और उनको भी सीबीआई की तरह पिंजरे में कैद तोता बना दिया गया है।
जब जांच करने वाले लोग अपने ही हों तो फिर भय किस बात का।
गोवा के दिवंगत सीएम मनोहर पर्रिकर ने राफेल खरीद के बाद इस्तीफा देकर रक्षामंत्री से बेहतर एक छोटे राज्य का पुन: सीएम बनना स्वीकार किया था और उनके पास भी कुछ दस्तावेज थे और फिर उनका भी निधन हो गया।
जो मौजूदा नागरिक उड्डयन मंत्री हैं उनके पिता माधव राव सिंधिया का निधन भी एक विवादित विमान हादसे में हो गया था।
अब गुजरात के ही पूर्व सीएम विजय रूपाणी जो पंजाब के भाजपा प्रभारी थे, वे दस्तावेज के साथ लंदन जा रहे थे और उनका विमान अहमदाबाद की सीमा को भी पार नहीं कर पाया।
अब धनकड़ का यह बयान जीवित रहेगा कि मौजूदा हालात लोकतंत्र के हित में नहीं है।
इससे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने भी बयान दिया कि वे 2020 से लगातार स्वयं को बदल रहे हैं। उन्होंने रिटायरमेंट की चर्चा भी कर दी। साथ ही वेद, पुराण आदि के प्रचार की जिम्मेदारी लेने का भी वचन किया।
राज्यसभा के सभापति का इस्तीफा यूं ही नहीं आता। देश के इतिहास में उन्होंने एक अध्याय लिखा है और इसकी चर्चा दशकों तक होगी। ओम बिरला के बारे में भी विपक्ष की राय सही नहीं है। लोकसभा के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने कृषि मंत्री नरेन्द्रसिंह तोमर का ही बयान डिलीट कर दिया। तोमर भी जाट थे और उन्होंने साफ कहा था कि देश में खून की खेती होती रही है। तोमर का बयान उनका सिर्फ मध्यप्रदेश तक सीमित कर गया। लेकिन इस बयान की भी जानकारी सामने आयेगी।
कुछ लोग नैतिकता के आधार पर बोलते भी हैं लेकिन संसद में उनके बयान को ही कार्यवाही में शामिल नहीं किया जाता।
Labels: jagdeep dhankar vijay rupani
Subscribe to Comments [Atom]
