Monday, March 2, 2026

 

अमेरिका-ईरान युद्ध : कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी. यूँ कोई...!



वाशिंगटन डीसी। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहा संघर्ष अब यूरोप तक पहुंच गया है। यूरोपियन यूनियन के सदस्य देश साइप्रस पर भी ईरान ने ड्रोन और बेलस्टिक मिसाइल से हमले किये। एक हमले में रनवे क्षतिग्रस्त हुआ है लेकिन अन्य हमलों को निष्फल कर दिया गया। वहीं कुवैत ने स्वीकार किया है कि रविवार रात को अमेरिका के तीन विमानों को गलती से उसके एयर डिफेंस से मार गिराया गया, हालांकि सभी 6 पायलट को सुरक्षित बचा लिया गया है और वह अस्पताल में हैं। अब इस मामले की जांच चल रही है कि यह गलती कैसे, क्यों और कहां हुई?

ईरान पर जहां अमेरिका और इजरायल ने अपने हमले जारी रखे और कई सरकारी संस्थानों और सैन्य क्षेत्रों को खत्म करने का दावा किया है।  यूएसए के रक्षामंत्री (युद्धमंत्री) पीट हेगसेथ ने कहा है कि ईरान के मिसाइल बनाने के संयंत्र पर हमला किया गया है और उसको नष्ट कर दिया गया। 

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का कहना है कि युद्ध चार से पांच सप्ताह तक चलने की संभावना है और अमेरिका के पास इससे कहीं ज्यादा समय तक युद्ध चलाने के संसाधन उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा, हमने पहले ही दिन पहले ही घंटे में अयातुल्ला खामेनेयी को मार गिराया। इसके अतिरिक्त और कई अधिकारियों व नेताओं को ढेर कर दिया गया। 

ईरान ने इजरायल, यूएई, सउदी अरब तथा साइप्रस सहित कई देशों में टारगेट हमले किये। इजरायल के प्रधानमंत्री का कहना है कि तेहरान ने सिविल क्षेत्र को निशाना बनाया जबकि येरूशलम आवासीय क्षेत्रों पर हमला नहीं कर रहा है। 

वहीं दुबई का इंटरनेशनल एयरपोर्ट बंद कर दिया गया है। 500 फ्लाइट के कैंसिल होने की जानकारी दी गयी है। ईरान लगातार यूएई को टारगेट कर रहा है। एयरपोर्ट पर ड्रोन से हमला किये जाने की आशंका के चलते यह कदम उठाया गया है। 

दूसरी ओर सउदी अरब में अरामको की रिफाइनरी को निशाना बनाते हुए हमला किया गया, जिससे वहां पर भारी नुकसान हुआ क्योंकि आग लग गयी। 


ट्रम्प अपने हजारों सैनिकों को हजारों किमी दूर क्यों भेजा?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हजारों सैनिकों को हजारों किमी दूरी ईरान के चारों तरफ घेरा डालने और बाद हमला करने के लिए भेजा। यह हमले क्यों जरूरी हो गये थे। कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,  यूँ कोई...इस तरह का कदम नहीं उठाता। 23 साल पहले तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा था, ईरान अमेरिका के लिए खतरा है। वक्त गुजरता चला गया, लेकिन अमेरिका का खतरा कम नहीं हुआ। अमेरिका का आरोप है कि हिजुबल्लाह जैसे प्रोक्सी संगठन को तैयार किया गया, जो विश्व समुदाय के लिए खतरा बन गये। 

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी. यूँ कोई...की इन पंक्तियों को इस तरह से पढ़ा जा सकता है कि ट्रम्प के पास भी अपने देश के नागरिकों की सुरक्षा आदि की चुनौतियां रही होंगी तभी तो इतना बड़ा कदम उठाया गया। हजारों सैनिकों, सैकड़ों विमान, दर्जनों शिप और युद्धपोत आदि भेजे गये। एक सैन्य अभियान आरंभ हो गया जो एक माह से भी अधिक समय से चलने की संभावना अमेरिका स्वयं जता रहा है। 

अयातुल्ला कैसे नाजी बन गये?

जर्मन के एडोल्फ हिटलर ने विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ पर ही हमला कर दिया था जो उनकी मदद कर रहा था। उसी तरह से ईरान ने भी गल्फ कंट्रीज पर ही हमला कर इस युद्ध की आग को भडक़ा दिया है। यह आग अब धीरे-धीरे फारस की खाड़ी को अपनी चपेट में ले रही है। अरब सागर के देश ईरान के खिलाफ जवाबी कार्यवाही के लिए स्वयं को तैयार कर रहे हैं क्योंकि उनकी देशों को भी लगातार निशाना बनाकर हमले किये जा रहे हैं। अयातुल्ला खां के लिए भी इसी तरह से कुछ शब्द एक शायर कहकर गया था, 

अगर समझा होता जि़ंदगी की रीत को,

तो यूं अल्विदा न होता, 

सुकून की जगह बस 

जख़्मों की बारिश पाले रहा।  

अयातुल्ला खामेनेयी तो चला गया किंतु ईरान की कमान जिस व्यक्ति के हाथों में भी है, वह एक ऐसी आग को जन्म दे रहा है जो  विकराल रूप धारण करती जा रही है। यूरोपीय यूनियन के देश साइप्रस को भी निशाना बनाया गया और वहां पर ब्रिटिश सेना के ऐयरबेस कैम्प पर हमला किया गया। हालांकि ब्रिटेन इस युद्ध का हिस्सा नहीं था। 

अरब के देशों के साथ यूरोपीयन यूनियन भी धीरे-धीरे युद्ध के मैदान में आ सकती है क्योंकि मजबूरी हो सकती है। नाटो के सभी सदस्य देश मेम्बर हैं और नाटो का अर्थ है कि एक देश पर हमला, सभी देशों पर हमला। अगर नाटो ऐसा नहीं करता है तो उसकी भी प्रांसगिकता पर सवाल उठने लाजमी हो जायेंगे।






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