Monday, February 23, 2026
इजरायल की यात्रा पीएम मोदी के लिए सबसे अहम!
श्रीगंगानगर। भारत गणराज्य की कैबिनेट सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं को हिन्दू प्रचारक होने का दावा करने के लिए विदेशी नेताओं को श्री मद्भागवत गीता महाग्रंथ की कॉपी भेंट करते हैं। गीता प्रेस को वे सम्मानित करते हैं। इस तरह से वे प्रचार करते हुए एक हिन्दूवादी नेता की छवि को बनाये रखने का दावा करते हुए 12 साल से शासन कर रहे हैं किंतु सत्य यह है कि इजरायल यात्रा यह भी बतायेगी कि उन्होंने श्री मद्भागवत गीता को अपने जीवन में अपनाया हुआ है, क्योंकि 2047 तो छोडिय़े 2027 भी पीएम के लिए मुश्किल होने वाला है और भारत सरकार की नीतियों के कारण देश के लोग भी अकारण युद्ध का सामना कर सकते हैं।
नरेन्द्र मोदी 10 सालों से अनेक बार कह चुके हैं कि इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतनयाहू उनके सबसे प्रिय मित्र हैं। अब वे उसी मित्र से मिलने के लिए 25 फरवरी को नई दिल्ली से रवाना होंगे और 26 फरवरी को देश लौटेंगे। इससे पहले वे येरूशलम में संसद को भी संबोधित कर सकते हैं।
दो दिन की यात्रा के दौरान वे वहां से लौटेंगे तो उत्तरी अमेरिकी देश के प्रधानमंत्री मार्क कोर्नी उनकी यात्रा की प्रतीक्षा कर रहे होंगे।
मध्य एशिया में तनाव के बीच करेंगे यात्रा
पीएम मोदी उस समय मध्य एशिया की यात्रा पर जा रहे हैं जब वहां पर तनाव बना हुआ है। इससे पहले उन्होंने 22 अप्रेल 2025 को सउदी अरब की यात्रा की थी। वे सउदी की सीमा में प्रवेश करनेवाले थे कि टीवी पर समाचार आरंभ हो गये कि मोदी को एस्कौर्ट करने के लिए अरब के फाइटर जेट पहुंच गये हैं और हवा में अनेक जेट भी दिखाये गये। स्वागत सत्कार के बाद अभी उन्होंने दोपहर का भोजन भी नहीं किया था कि पहलगाम में आतंकवादी हमले की सुर्खियां दुनिया के सामने पहुंच गयीं।
पीएम वहां से बिना भोजन और मेजबान नेताओं से मिले बगैर वहां से रवाना हो गये और नई दिल्ली पहुंचकर एयरपोर्ट पर ही उन्होंने जो अल्पाहार लेना था, वह लिया और इसके बाद तनावपूर्ण स्थिति की समाचार आ गयी। सउदीअरब ने पाकिस्तान के सिर पर हाथ रख दिया। अब दोनों देश नाटो की तरह मित्र हो गये हैं। एक पर हमला तो दूसरे पर हमला समझा जायेगा।
इजरायल यात्रा क्या कहती है?
इजरायल के प्रधानमंत्री नेतनयाहू हाल ही में वाशिंगटन की यात्रा से लौटे हैं। वे वहां विदेश मार्को रूबियो, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से अलग-अलग मुलाकात कर उनके विचारों के साथ लौटे हैं।
इसमें कहने में कोई संकोच नहीं है कि अमेरिका और भारत गणराज्य की सरकार के बीच इस समय ऐसा तनाव है, जो पहले कभी नहीं रहा। कोल्ड वॉर जारी है। यह कभी भी युद्ध का रूप ले सकता है।
पिछले कुछ दिनों के भीतर ही तनावपूर्ण क्षण भी आये और उस समय लगा था कि दोनों तरफ के फाइटर हवा में नजर आ सकते हैं।
अब इजरायल के पीएम नेतनयाहू से पीएम मोदी से मिलेंगे तो पर्दे के पीछे जो बात होगी वह डोनाल्ड ट्रम्प के दिये गये संदेश और बदले में प्राप्त प्रतिक्रिया ही होगी। पर्दे के सामने भले ही पीएम मोदी को जो भी सम्मान मिले, लेकिन पर्दे के पीछे का असली खेला होगा और यह क्या होगा, अभी इसकी कल्पना की जा सकती है।
कल्पना यही है कि अमेरिका टैरिफ के अलावा भी भारत से कुछ हासिल करना चाहता है। भारत सरकार के पास पेट्रोल के कुएं तो है नहीं, इस कारण वह हमला कर रहा हो। न ही उसको भारत की भौतिकी सम्पत्ति से कोई लगाव है। जिसके लिए यह तनाव बना हुआ है। अमेरिका भारत सरकार की नीतियों से बिलकुल प्रसन्न नहीं है और वाशिंगटन-क्रेमलिन के बनाये गये दबाव का ही परिणाम है कि 18 प्रतिशत तक जीएसटी को सीमित कर दिया गया। सरकार पर दबाव है कि वह टोल नीति में भी परिवत्रन करे क्योंकि श्रीगंगानगर से मुम्बई तक ट्रक के एक राउंड के 20 से 25 हजार तक का टोल लग रहा है।
यह महंगाई जनता को खायी जा रही है। आय कमजोर होती जा रही है और सडक़ ठेकेदार, सीमेंट कंपनियों को सीधा फायदा पहुंचाया जा रहा है। इस तरह से अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है जिससे लूट की दुकानों को बंद किया जा सके। लगभग हर मंत्री ने अपने लिये एक दुकान को खोल कर रखा हुआ है।
रूस ने हथियार देने से मना कर दिया
अगर रूस की मीडिया रिपोर्ट और थिंक टैकं के विचारों को सामने लाकर समझा जाये तो सामने आता है कि ब्लादीमिर का ‘जोरदार स्वागत’ के बाद भी मास्को ने हथियारों से संबंधित समझौता नहीं किया। इसी तरह से अमेरिका भी फाइटर जेट को बेचने से बच रहा था।
क्या कहता है गीता का ज्ञान
श्री मद्भागवत गीता का ज्ञान यही कहता है कि एक सच्चा मित्र वही है जो उचित परामर्श दे जो उसकी और उसके मुल्क की तरक्की करे। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ अपना रिश्ता बनाये रखने के लिए या उसको मजबूत करने के लिए अपनी बहन सुभद्रा का विवाह परिवार की सहमति के बिना कर दिया था। युद्ध के मैदान में पूरा ज्ञान दिया। उसी तरह से नेतनयाहू की जो उचित सलाह हो उसको मोदी को स्वीकार करना चाहिये। जो उचित नहीं लगे उसको छोड़ देना चाहिये।
पीएम मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति से सीधा मिलने से परहेज कर रहे हैं। इस तरह से इजरायल एक मध्यस्थ की भूमिका में है।
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