Monday, February 2, 2026

 

राफेल डील से एक पंथ और दो निशाने साध रहे हैं मोदी, मैकां के साथ अपनी राजनीति को भी बचाने का प्रयास



श्रीगंगानगर। क्रिकेट के जानकार जानते हैं कि अगर दो बॉल पर रोहित शर्मा और विराट आउट हो जायें तो भारत के मैच जीतने की क्षमता कितनी प्रभावित हो जाती है, उसी तरह से भारत के दो दशक या इससे भी अधिक समय से रक्षा सहयोगी रहे अमेरिका, रूस दोनों ही अब भारत की मुख्य रक्षा जरूरतों से दूर हो रहे हैं। नया पार्टनर तलाशा गया है पेरिस। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रां इस समय अपने देश में सबसे बड़े राजनीतिक संकट का सामना कर रहे हैं क्योंकि एक वर्ष के भीतर उन्होंने पांच प्रधानमंत्रियों को बदला है। अगले वर्ष राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हैं और ऐसे समय उन्हें राजनीतिक खुराक की आवश्यकता थी जो भारत गणराज्य की नरेन्द्र मोदी सरकार दे रही है। 

यह समाचार आम सामान्य समाचार नहीं है बल्कि भारत की विदेश, आर्थिक और रक्षा नीति को उजागर करने वाला समाचार है। 

भारत सरकार फ्रांस के साथ रक्षा समझौता कर रही है। उस समय जब अमेरिका, रूस अपनी विदेश नीति को परिवर्तित कर रहे हैं। दिखाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है किंतु हकीकत वही होती है जब सहयोग मिलता हो। 

नरेन्द्र मोदी सरकार इस समय दुनिया में सबसे बड़े दबाव का सामना कर रही है। पिछले यूरोप के दो बड़े नेता दिल्ली की यात्रा पर थे, इनमें जर्मनी के चांसलर और पौलेण्ड के विदेश मंत्री। दोनों ने ही भारत के समक्ष कुछ मुद्दों पर असहमति जतायी है। 

रूस के राष्ट्रपति पहले ही कह चुके हैं कि वे व्यापार से ज्यादा व्यक्तिगत रिश्तों को महत्व देते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि                  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पत्नी मेलानिया ट्रम्प ने रूस के ब्लादीमिर पुतिन को भाई बनाया हुआ है और भारत की यात्रा से पहले राष्ट्रपति पुतिन ने अलास्का की यात्रा की थी। वहां ट्रम्प के साथ मुलाकात हुई थी और ट्रम्प ने पुतिन को मेलानिया का एक पत्र दिया था, जो गोपनीय था। यह जानकारी स्वयं मेलानिया ट्रम्प ने एक इंटरव्यू के दौरान दी है। 

राष्ट्रपति पुतिन की यात्रा के दौरान रक्षा खरीद के लिए बड़ा समझौता नहीं हो पाया, जिसका प्रचार किया जा रहा था। 

इससे साफ हो जाता है कि पुतिन और ट्रम्प दोनों का दबाव मोदी पर था और मोदी को एक ऐसा सहयोगी चाहिये था, जो स्वयं दबाव में हो और दोनों मिलकर एक दूसरे की जरूरतों को पूरा कर सकें। 

भारत गणराज्य की सरकार ने एक साथ 121 राफेल विमान खरीद का समझौता करने की तैयारी कर ली है और इसके साथ अन्य हथियार की भी खरीद होगी। ध्यान रहे कि पेरिस स्वयं बड़े हथियार अमेरिका से खरीदता रहा है। 

अब फ्रांस से करीबन सवा तीन लाख ट्रिलियन रुपये की खरीद को अन्तिम रूप दिया जा रहा है और बजट में इसका प्रावधान भी कर दिया गया है। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि राफेल जनरेशन सिक्स के नहीं है जो अमेरिका और रूस व चीन के पास है। 

पेरिस की राजनीति को नजदीकी से देखा जाये तो राष्ट्रपति मैक्रां मध्यमार्गी हैं। व दक्षिणपंथी या वामपंथी नहीं है। हालांकि मौजूदा सरकार में उनको कुछ वामपंथी सहयोग कर रहे हैं। 2027 में तीसरी बार वे राष्ट्रपति पद के लिए दावेदार हो सकते हैं। उन्होंने पिछले साल संसदीय चुनाव करवाये थे, जिनमें उनको बहुमत नहीं मिल पाया था। 


पेरिस को खुराक से यूरोपीय समर्थन

नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री रहते हुए इस तरह की दबाव की राजनीति को नहीं देखा था और न ही कभी बहुमत को खोया था। इस बार उनकी पार्टी लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं रखती है। बिहार की जनता दल (नीतिश कुमार), आंध्रप्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी ने उनको समर्थन दिया हुआ है। वे गुजरात के सीएम थे तो तीनों बार उन्होंने पूर्ण बहुमत हासिल किया था। 

राजनीति के जानकार एक बौन्ने का कहना था कि संयुक्त राष्ट्र संघ में फ्रांस के पास वीटो पावर है। यूरोप और ब्रिटेन की राजनीति में पेरिस के पास दबदबा है। इस तरह से वे उनकी मदद कर खुद की मदद भी चाहते हैं। 

इस बार बजट 50 लाख करोड़ से ज्यादा का था और करीबन 8 लाख करोड़ रुपये का रक्षा बजट है। उनके इस बजट के बाद दूसरा नंबर परिवहन मंत्रालय को दिया गया। 


युद्ध की तैयारी तो आधारभूत ढांचा के लिए इतना बजट क्यों?

इस समय यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर नरेन्द्र मोदी सिंदूर 2.0 की तैयारी करते हुए रक्षा बजट को 15 प्रतिशत तक बढ़ाया है तो फिर आधार भूत ढांचा के लिए इस वर्ष इतना बड़ा बजट क्यों रखा गया जो तीन लाख करोड़ से ज्यादा का है। दोनों एक दूसरे के परस्पर विरोध का बजट हो गये। कृषि, ग्रामीण विकास और शिक्षा मंत्रालय के तीनों बजट को जोड़ दिया जाये तो उससे भी कहीं ज्यादा बजट एक ही मंत्रालय को दिया गया है। 

अगर सरकारी स्कूलों की हालत को देखा जाये तो आज भी उनकी स्थिति को विश्वस्तरीय नहीं कहा जा सकता। 


अर्थव्यवस्था या व्यक्तिगत आय बढ़ी

भारत सरकार दावा करती है कि वह तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। जब हम प्रति व्यक्ति आय देखते हैं तो पता चलता है कि नई दिल्ली से ही सहायता प्राप्त करने वाले मालद्वीव और भूटान, भारत से आगे है अर्थात भारत से ज्यादा सहायता प्राप्त करते हैं। जब हमें 2026 पर ध्यान केन्द्रित करते हुए भारतीयों की आय को एक सम्मानजनक स्थान की ओर ले जाना चाहिये था, उस समय राफेल विमान खरीदकर तमिलनाडू, पश्चिम बंगाल, गुजरात के चुनाव जीतने के लिए तैयारी कर रहे हैं। सेना के नाम पर एक बार फिर से चुनाव जीतने की तैयारी हो रही है। 

दूसरी ओर संसद में सोमवार को ही यह सामने आया कि भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय ने पूर्व सेनाध्यक्ष श्री नरवणे की एक पुस्तक को प्रकाशित होने से रोक दिया है। 






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