Wednesday, January 14, 2026

 

फ्रांस-भारत के बीच नाटो समझौता होगा? पेरिस चुनाव से पहले मैक्रों को राजनीतिक खुराक या मोदी हिटलर की भूमिका निभायेंगे?



श्रीगंगानगर। 19वीं सदी के जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर को इतिहासकार इसलिए याद करते हैं क्योंकि उन्होंने साम्राज्यवाद को विस्तृत रूप देने के लिए दुनिया को विश्वयुद्ध-2 में धकेल दिया था। हिटलर हर जगह पर अपनी तस्वीर, अपना नाम देखना चाहते थे। 19वीं शताब्दी के उस दौर को याद कीजिये जब अधिकांश देशों में वेब प्रेस या टीवी नहीं हुआ करते थे, उस समय हिटलर के साथ हर समय काफिले में एक कार चला करती थी जिसकी छत पर खड़े होकर कैमरामैन उनकी हर गतिविधि को कैप्चर किया करता था। राष्ट्राध्यक्षों के साथ बैठक के दौरान भी हिटलर का स्वयं का कैमरामैन बैठक में तस्वीर लेने के लिए अधिकृत होता था। 

भारत गणराज्य की सरकार की कैबिनेट के प्रमुख नरेन्द्र मोदी को देखते हैं तो बरबस ही वह दौर याद आ जाता है। पीएम मोदी स्वयं को नॉन बायोलॉजिकल या ईश्वरीय अवतार के रूप में पेश करते हैं। हजारों की संख्या में उनके पेड कर्मचारी हैं जो सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीर पेश करते हैं। जब भी उनको यह लगता है कि वे फ्रंटफुट पर नहीं खेल पा रहे हैं तो तुरंत भगवान शंकर के उपासक के रूप में छाने का प्रयास करते हैं। 

सउदी अरब और पाकिस्तान के बीच परस्पर सैन्य सहयोग रक्षा समझौता हुआ है। भारत भी अब उस तरह का समझौता किसी वीटो पॉवर के साथ करना चाहता है। यूएसए से सहयोग नहीं मिला तो वापिस मास्को की ओर रुख करना पड़ा। क्रेमलिन से राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन ने नई दिल्ली की यात्रा भी की किंतु वे कोई बड़ा आश्वासन देकर गये हों, यह जानकारी सामने नहीं आयी। रूस ने जैनरेशन 6 जैसा फाइटर जेट के लिए कोई समझौता नहीं किया। 

जर्मन के चांसलर भी कोई बड़ा आश्वासन देकर गये हों, यह भी जानकारी सामने नहीं आयी। अब फ्रांस के साथ फिर से डील पर बात चल रही है। अगले महीने पेरिस से इमैनुअल मैक्रां आने वाले हैं। मैक्रां की इस समय फ्रांस में लोकप्रियता में लगातार गिरावट को देखा जा रहा है क्योंकि वे एक साल के भीतर पांच प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। 

अगले साल उनको राष्ट्रपति चुनाव के लिए मैदान में उतरना है। वे भी चाहते हैं कि एक बड़ा रक्षा सहयोग समझौता हो, जिससे वे अपने समर्थक मतदाताओं को विश्वास प्राप्त कर सकें। मैक्रां अगले महीने फरवरी में भारत आ रहे हैं। 

उनकी यात्रा को भी लाइमलाइट बनाये जाने की तैयारी है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन जब दशकों बाद भारत की यात्रा करने वाले प्रथम राष्ट्रपति बने थे तो टीवी पर उनको पांच दिन तक कवरेज किया गया और यह संकेत दिया गया कि दोनों देश नजदीक आ रहे हैं, लेकिन वे भारत से रवाना होने के बाद पाकिस्तान चले गये और इस तरह से भारत की मेजबानी फीकी हो गयी। 

अब पेरिस से आने वाले इमैनुअल मैक्रां की भी यात्रा को यही रूप दिया जा रहा है। वे फरवरी माह में नई दिल्ली की यात्रा करेंगे। उस समय भारत और फ्रांस के बीच करीबन 4 लाख करोड़ रुपये अर्थात 4 ट्रिलियन भारतीय रुपये का रक्षा सौदा होगा। 

यह  फ्रांस के इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा सौदा हो सकता है। भारत का हर साल का बजट करीबन 40 लाख करोड़ रुपये का होता है। बजट का 10 प्रतिशत वे रक्षा सौदे के लिए खर्च करने वाले हैं। हर साल बजट में रक्षा मंत्रालय के अधीन जो रुपये जारी किये जाते हैं, यह उससे अलग हैं। इस तरह से करीबन 6-7 लाख करोड़ रुपये रक्षा क्षेत्र में ही खर्च होने वाले हैं। 


ट्रम्प से बातचीत नहीं करना चाहते

भारत की आर्थिक स्थिति इस समय बढिय़ा नहीं कही जा सकती। हर साल लाखों बेरोजगार कॉलेज से बाहर आते हैं और उनके लिए कोई स्र्टाटअप, नौकरी आदि का प्रावधान नहीं होता और वे भी बेरोजगारों की सूची में शामिल होकर स्ट्रगल लाइफ का हिस्सा बन जाते हैं। 

अमेरिका और भारत गणराज्य की सरकार के बीच कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर मतभेद हैं और इसी कारण नई दिल्ली से आयात होने वाले समान पर वाशिंगटन ने 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया हुआ है। अब ईरान से तेल खरीदना भी महंगा हो सकता है। क्योंकि 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ का प्रावधान करने के आदेश राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दिये हैं। 

इस तरह के हालात में होना यह चाहिये था कि भारत सरकार के पीएम मोदी वार्ता के लिए आगे आते और ट्रम्प के साथ वार्ता कर मामले को सुलझाने का प्रयास करते। दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर वार्ता रूकी हुई है। 

ऐसे में समझौता करने के बजाय भारत सरकार अपने बजट का करीबन 10 प्रतिशत अर्थात 4 लाख करोड़ रुपये फ्रांस को रक्षा क्षेत्र में समझौता करने के लिए खर्च कर रहा है। 

चार लाख करोड़ से भारत की सभी तहसीलों में बने अस्पतालों में ब्लड बैंक, सीटी स्कैन जैसी मशीनों का इंतजाम किया जा सकता था। ग्राम पंचायतों को शहरी रूप दिया जा सकता था। इसके अलावा और भी बहुत कुछ हो सकता था जिससे भारतीय लोगों का जीवनस्तर कहीं अधिक मजबूत और हाईलेवल का होता। 

अब क्या होता है तहसील मुख्यालय पर डॉक्टर्स और संसाधनों की कमी के कारण उनको जिला मुख्यालय या संभाग मुख्यालय पर रैफर कर दिया जाता है। 

अगर देखा जाये तो सामने आता है कि पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार और अन्य पड़ोसी छोटे देश भारत के खिलाफ एकजुट होकर युद्ध करते हैं तो यह युद्ध दो दिन में ही समाप्त हो जायेगा क्योंकि इन लोगों के पास संसाधनों का अभाव है। 

इसी तरह से अमेरिका के खिलाफ भारत कब तक संघर्ष कर सकता है। अमेरिका का रक्षा बजट ही भारत के पूर्ण बजट से दो गुणा या उससे भी कहीं अधिक होता है। 

सामाजिक सुरक्षा के तहत जो अमेरिका से मदद मिल रही थी, वह भी बंद हो गयी है। अमेरिका ने भारत सरकार को तीन साल दिये हैं और तीन सालों के भीतर भारत-अमेरिका के बीच युक्रेन युद्ध को लेकर बात नहीं बन सकी। 

आईएमएफ के अध्यक्ष अजय बंगा भारतीय मूल के हैं तो इस कारण यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था भी भारत सरकार के बाबुओं के आकड़ों के आधार पर तेजी से उभरती संस्था का तगमा दे देती है। बंगा को जब बाइडेन प्रशासन ने नियुक्त किया था तो उस समय वे मोदी का आशीर्वाद लेने के लिए दिल्ली आये थे। इस तरह से मोदी और बंगा के बीच जो संबंध हैं, वह दुनिया के सामने आ चुके हैं। 


सेना को मजबूत करने की जरूरत लेकिन..

भारतीय सेना को मजबूत करने की आवश्यकता है लेकिन अन्य मदों में कटौती कर एक युद्ध की तैयारी में जुट जाना भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश के लिए उचित कहा जा सकता है?

भारत को गांवों से शहरों की ओर पलायन, महिला सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा और गर्भवती महिलाओं के जीवन को मजबूत करने के लिए उद्यम करने की आवश्यकता है। करोड़ों लोगों को रोजगार की चिंता करनी है। यूरोपीय देश विकसित राष्ट्र होने के बावजूद रक्षा खर्च के लिए आवश्यक बजट का प्रावधान करते हुए अपने देश के नागरिकों की जीवन रक्षा को मजबूत करने के लिए कदम उठाते हैं। 

हम अगर पीएम मोदी की एडोल्फ हिटलर बनने की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ जाते हैं तो क्या होगा?

अमेरिकी तनाव के बीच भारत पर ऋण का दबाव बढ़ता जा रहा है और इसके लिए यह आवश्यक हो जायेगा कि भारत सरकार अतिरिक्त लोन ले या अतिरिक्त नोट छापे जिससे दोनों ही परिस्थितियों में महंगाई बढ़ जायेगी। 


पेरिस अगर भारत की रक्षा नहीं कर पाया तो...

मैक्रां दो साल पहले जयपुर आये थे। 25 जनवरी 2024 को जयपुर में रोड शो में भाग लिया था। चाय पर चर्चा की थी और यूपीआई से चाय का भुगतान किया था और फिर भाजपा की ओर से आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया था। 

मैक्रां जो स्वयं पेरिस में राजनीतिक संकट का सामना कर रहे हैं। अगले साल उनको विभिन्न तरह के आंदोलन यथा लीविंग कोस्ट आदि को लेकर चुनाव मैदान में उतरना है और वे भारत सरकार के साथ नाटो जैसा समझौता नहीं कर पाये तो 4 लाख करोड़ रुपये खर्च करने के क्या फायदे या नुकसान होंगे? 






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