Saturday, January 10, 2026
ट्रम्प ने चीन को बेचारा बना दिया?
श्रीगंगानगर। ब्रिक्स के जरिये दुनिया से अमेरिका का प्रभुत्व समाप्त करने के लिए चीन, रूस आदि ने एक राय होकर अपनी करंसी निकालने का निर्णय लिया था,उसी तरह से जैसे यूरोपीय संघ की अपनी मुद्रा है जो सदस्य देशों की मुद्रा और उनके भाव से अलग है।
अगर समाचार को संक्षेप में बनाया जाये तो इसको गंभीरता से समझने की आवश्यकता है।
अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अपनी कैद में ले लिया है और अब काराकस में वही हो रहा है जो डोनाल्ड ट्रम्प ओवल ऑफिस में बैठकर निर्णय ले रहे हैं क्योंकि वहां पर उपराष्ट्रपति को ही कार्यवाहक पे्रजीडेंट बना दिया गया है। वेनेजुएला के तेल पर पहले चीन का दबदबा था जो अब वाशिंगटन का हो गया है।
दूसरी ओर अन्य तेल उत्पादक देश सउदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ ट्रम्प परिवार के व्यापारिक रिश्ते हैं। ट्रम्प के दामाद जे. कुशनर और मोहम्मद बिन सलमान मित्र ही नहीं पार्टनर भी हैं।
वहीं ट्रम्प ने इजरायल की नाराजगी को अनदेखी कर सउदी को आधुनिक हथियार बेचने का निर्णय लिया है। इस तरह से अरब की सुरक्षा सुनिश्चित कर दी गयी है। इस कारण मोहम्मद बिन सलमान चीन या अन्य किसी राष्ट्र के दबाव में नहीं आने वाला है।
यूएई और अन्य देश पहले ही कई देशों के साथ समझौते में है। ईरान और रूस पर तेल आयात करने पर भारी-भरकम जुर्माने का प्रावधान किया गया है। जिसको टैरिफ के रूप में स्वीकार किया जाता है।
अब नाइजरिया और कई अन्य देश रह गये हैं जो ब्रिक्स देशों की मांग को पूरा नहीं कर पायेंगे। इस तरह से चीन को एक तरह से बेचारा बना दिया है।
भारत-चीन पर 500 प्रतिशत जुर्माने का प्रावधान
एक निजी बिल जो रिपब्लिकन सांसद ने पेश किया था, उस बिल पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रमप ने हस्ताक्षर कर दिये हैं। संसद में रिपब्लिकन का दबदबा है और वह बिल पास हो जाता है तो ब्रिक्स के भारत, चीन व ब्राजील पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है।
ट्रम्प के पास असीमित शक्तियां हैं?
डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति के रूप में दूसरी बार व्हाइट हाउस आये हैं तो उनके पास फस्र्ट टर्म के मुकाबले कहीं ज्यादा अनुभव है। उनको पता है कि उनके पास असीमित शक्तियां हैं। संसद से उनकी किसी योजना के खिलाफ प्रस्ताव पारित भी हो जाता है तो वह कानून नहीं बन पायेगा क्योंकि ट्रम्प उसको वीटो कर सकते हैं और दूसरी बार संसद में पास करवाने के लिए उस बिल के लिए दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी, जो शायद मुमकिन नहीं है।
ट्रम्प अपनी शक्तियां को जान व पहचान गये हैं और इसी कारण उन्होंने कहा है कि उनको अंतरराष्ट्रीय कानून की आवश्यकता नहीं है।
दुनिया पर दबदबा क्यों हैं अमेरिका का?
संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य कार्यालय अमेरिका में स्थापित हो गया है और वर्ष भर से वहीं से ही सारे कार्य होते हैं। वहीं सितंबर माह में वार्षिक सम्मेलन का आयोजन होता है और उस समय करीबन 100 से ज्यादा राष्ट्राध्यक्ष अमेरिका का दौरा करते हैं। वे यूएन की सभा को संबोधित करने के बाद अमेरिका की सैर भी करते हैं तो वह भी अमेरिकी धन के माध्यम से होता है।
हर साल अरबों डॉलर अमेरिका यूएन की बैठक के लिए खर्च करता है और वीवीआईपीज की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बल की नियुक्ति की जाती है।
इस तरह से हर साल अरबों रुपये वह खर्च कर दुनिया पर अपना दबदबा बनाये रखता है और उसका यह अधिकार भी है। बाकी देश तो अपनी जनता की सुरक्षा के लिए रक्षा बजट को भी बढ़ाने से पहले अनेक बार विचार करते हैं।
फ्रांस क्या भारत को बेच रहा है राफेल
संभवत: रूस के साथ भारत की आधुनिक विमान खरीदने की योजना धरी की धरी रह गयी है और इसी कारण वीटो पॉवर वाले देश फ्रांस को प्रसन्न करने के लिए भारत सरकार कई हजार करोड़ के हथियार और लड़ाकू विमान खरीद रहा है।
हालांकि राफेल 4.5 जनरेशन के हैं लेकिन इसके बावजूद खरीद करना भारत की मजबूरी हो गयी है। विमान बनाने वाले देशों में अमेरिका, रूस और फ्रांस आदि देश ही हैं। अमेरिका ने हथियार बेचने से इन्कार कर दिया क्योंकि वहां पर सत्ता बदल गयी है और ट्रम्प पहले पीएम नरेन्द्र मोदी से अपनी नाराजगी दूर करना चाहते हैं।
इस तरह से राफेल खरीद के लिए अगले माह समझौता हो सकता है और राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रां भारत यात्रा पर आ रहे हैं, उस दौरान समझौता हो सकता है।
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