Friday, December 12, 2025
किसान एकजुट रहे तो मोदी-शाह टिब्बी भी आयेंगे!
श्रीगंगानगर। हरियाणा से चिपते राजस्थान के टिब्बी कस्बा, जो हनुमानगढ़ जिले का भाग है, वहां पर किसान आंदोलन डेढ़ साल से चल रहा है और अब इसमें आग लग गयी है। अनेक वाहन जल चुके हैं और फैक्ट्री को क्षतिग्रस्त कर दिया गया है।
टिब्बी के राठी खेड़ा गांव में एक एथेनॉल बनाने वाली फैक्ट्री लगायी जा रही है। वहां पर मक्का से इस पदार्थ को बनाया जायेगा।
राठी गायं राजस्थान की सबसे प्रिय गाय है और यह कम पानी में भी अपने जीवन को सहज बनाने में शक्ति प्राप्त हैं। वहीं भगवान महेश की संतान के रूप में माहेश्वरी जाति में भी राठी गौत्र है।
इस तरह से राठी खेड़ा गांव शब्दों के अनुसार सीधे महाकाल अर्थात भगवान शिव के साथ अटैच हो जाता है।
उसी गांव में मक्का का उत्पादन होगा। फिर उससे एथेनॉल बनाया जायेगा।
अब इस समाचार के फैक्ट को देखें तो हजारों किसानों ने पिछले दिनों जनसभा के दौरान फैक्ट्री की दीवार को गिरा दिया था और अनेक वाहनों में आग लगा दी थी। इस मामले में संगरिया के विधायक, कामरेड नेता बलवान पूनिया, सांसद कुलदीप इंदौरा आदि को नामजद करते हुए मुकदमा दर्ज किया गया है।
किसानों का आंदोलन
पिछले 10 सालों से पंजाब, हरियाणा और राजस्थान आदि स्थानों पर किसानों के बड़े आंदोलन हो रहे हैं। हाल ही में कर्नाटक में तीन लाख से भी अधिक किसान एकजुट हो गये और गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे थे। इसी तरह से महाराष्ट्रा में प्याज के मूल्य से रूष्ट किसानों ने आंदोलन किया।
राजस्थान के घड़साना-रावला क्षेत्रों में बड़ा आंदोलन हुआ और पांच किसानों की पुलिस की गोली से मौत हो चुकी है।
सवाल यह है कि किसान देश के अन्नदाता ही नहीं बल्कि जीडीपी का आधार पर भी हैं। उन किसानों को बार-बार आंदोलन करना है तो इससे सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े हो जाते हैं। अनेक ऐसी फसलें हैं जिनका समर्थन मूल्य तो घोषित होता है किंतु उसकी खरीद नहीं होती और बाजार में वह कहीं कम कीमतों में बेची जाती है।
1975 में जेपी आंदोलन हुआ और इंदिरा गांधी की सरकार चली गयी। 2010 के दशक में अन्ना हजारे का आंदोलन हुआ तो फिर से कांग्रेस की सरकार को जाना पड़ा, यह अलग बात है कि सशक्त लोकपाल अधिनियम उस आंदोलन में गुम हो गया और आंदोलन के नायक राजनेता बन गये।
टिब्बी ही क्यों?
एथेनॉल के लिए टिब्बी ही क्यों चुनी गयी। यह भौगोलिक ही नहीं बल्कि सामाजिक, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बड़ा सवाल है। टिब्बी संगरिया से 30 किमी की दूरी पर है। वहां पर कोई नैशनल हाइवे भी नहीं है जबकि हनुमानगढ़ में है। हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय के आसपास इस उद्योग स्थापित किया जाता तो समझ भी आती कि यह लोगों को रोजगार और किसानों के उत्पादों के लिए मददगार होगा।
अब किसान एकजुट हो रहे हैं। हनुमान बेनीवाल संसद में भी इस सवाल को उठा चुके हैं। अब कुछ बड़े किसान नेता भी हनुमानगढ़ जिले में आ रहे हैं। इस तरह से यह आंदोलन एक व्यापक रूप ले रहा है।
किसानों ने दो साल तक दिल्ली और फिर एक साल तक अम्बाला में रास्ता जाम रखा था।
भारत की कृषि नितियों की नजर रखने वाले एक ज्ञाता बताते हैं कि अगर किसान एकजुट रहते हैं तो निश्चित रूप से उनसे वार्ता करने के लिए टिब्बी भी आयेगी। सवाल आंदोलन को मजबूती के साथ चलाने को है।
भले ही किसानों को दिल्ली से एमएसपी का बिल नहीं मिला, लेकिन इससे निराश होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उस आंदोलन ने ही देश में किसानों को एकजुट होने का अवसर दिया। अब किसानों को टिब्बी आंदोलन को मजबूत करते हुए केन्द्र तक अपनी आवाज को पहुंचाने का उचित अवसर है।
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