Monday, October 6, 2025

 

फ्रांस की सरकार फिर से गिर गयी, कैबिनेट का संचालन एक दिन भी नहीं हो पाया



पेरिस। यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले फ्रांस में एक बार फिर से सरकार का पतन हो गया। बजट को लेकर पूर्व में एक साल के भीतर तीन सरकारें गिर चुकी हैं और दो सालों के भीतर छठे प्रधानमंत्री का चयन अब किया जायेगा। दक्षिण पंथी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रां को देश के भीतर अब विरोध का सामना करना पड़ रहा है। 

सेबेस्टियन लेकार्नू जिन्हें एक माह पूर्व ही राष्ट्रपति ने नामित किया था। लेकार्नू ने रविवार को ही कैबिनेट का गठन किया था और सोमवार को हालात यह हो गये कि उनको इस्तीफा देना पड़ा। उनके मंत्रीपरिषद के सभी सदस्यों ने भी राष्ट्रपति को अपने त्याग पत्र सौंप दिये। 

फ्रांस को इमैनुअल मैक्रां संबोधित करने वाले हैं और माना यह जा रहा है कि एक साल के भीतर उनको दूसरी बार वोटिंग के लिए जाना पड़ा। संसद को भंग कर चुनाव करवाये जा सकते हैं। दक्षिण पंथी पार्टी के पास बहुमत का अभाव है और वामपंथी दल अन्य दलों के साथ मजबूत स्थिति में है लेकिन राष्ट्रपति वामपंथियों को सरकार सौंपने को शायद ही तैयार हों। 

अगर फ्रेंच मीडिया की रिपोर्ट को आधार बनाया जाये तो मैक्रां  की लोकप्रियता कमजोर हुई है। 2022 में वे दूसरी बार राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। 

पश्चिमी देश ऋण के कारण भारी मुश्किल में

असल में पश्चिमी देशों ने सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले अत्यधिक लोन उठाये हुए हैं और इस कारण घरेलू खर्चों पर दबाव बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार जीडीपी का 115 प्रतिशत लोन फ्रेंच पर है जो 3 हजार करोड़ डॉलर से कहीं अधिक है। 

अभी हाल ही में एक विश्वस्तरीय रिपोर्ट में सामने आया था कि फ्रेंच सरकार में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है और ईमानदारी के मुकाबले उसका रैंक नीचे गिरा है। कमजोर पारदर्शिता को यूरोपीयन लोग भी समझ रहे हैं। 

यूरोप में प्रमुख अर्थव्यवस्था जर्मनी, इटली और फ्रांस आदि हैं। जर्मन और फ्रांस में कलकारखाने तो हैं लेकिन कॉमनवेल्थ के अनेक देश ऐसे हैं जो शिक्षा, पर्यटन आदि के सहारे ही अपनी अर्थव्यवस्था का निर्वह करते हैं। 

हालांकि भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री के साथ उनके निकट संबंध माने जाते हैं और इसी कारण वे अनेक बार भारत की यात्रा कर चुके हैं। 

भारत में पारदर्शिता की भारी कमी

अगर भारत की अर्थव्यवस्था जो देश की रीढ़ की हड्डी होता है, में पारदर्शिता काफी कमजोर है। आरबीआई के गर्वनर को भी यह जानकारी नहीं होती कि उनके हस्ताक्षरित कितने नोट भारत सरकार की कंपनियां छाप रही हैं। यह जानकारी सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त हुई थी कि बंगलोर और अन्य स्थान पर प्रकाशित होने वाली भारतीय मुद्रा की पूरी रिपोर्ट आरबीआई के पास नहीं होती है। जबकि डिजीटल हस्ताक्षर आरबीआई के गर्वनर के होते हैं। 

बजट को देखा जाये तो उसमें एक वर्ष के भीतर प्रस्तावित कार्यों का मसौदा होना चाहिये, लेकिन कैबिनेट की बैठक में यह तय होता है कि किस क्षेत्र को कार्यों के लिए कितना बजट जारी किया जाना है। इस तरह से बजट पेश करने का कोई महत्व ही नहीं रह गया। अनुदान मांगों को पूरा करने के लिए एक स्पीच होती है और पक्ष-विपक्ष के हंगामे के बीच वह पारित हो जाती हैं। 

परिवहन मंत्रालय के प्रभारी कहते हैं कि उन्होंने 11 सालों में 60 लाख करोड़ रुपये का आधारभूत ढांचा तैयार किया है जिसको एनएच कहा जाता है। बजट में तो प्रत्येक साल के लिए पांच लाख करोड़ रुपये रक्षा अथवा स्वास्थ्य क्षेत्र को भी नहीं दिया जाता। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि कैबिनेट की बैठक में ही अलग से बजट जारी हो जाता है और इसके लिए विभिन्न एजेंसीज से लोन लिया जाता है। 

रेल मंत्रालय भी पूर्व में अपनी रेलगाडिय़ों के बजट आदि के लिए अलग से प्रारूप लोकसभा-राज्यसभा में पेश करता था और अब हालात यह है कि यह परंपरा समाप्त कर दी गयी और किस रेलवे स्टेशन से रेलगाडिय़ां चलायी जानी है, यह भी कैबिनेट में ही तय होता है। कैबिनेट का प्रभार पीएम के पास होता है और इस तरह से पीएम तय करते हैं कि कहां सडक़ बननी है और कहां रेलगाड़ी चलायी जानी है। 

रेलगाड़ी या सडक़ का लोर्कापण-शिलान्यास करने के लिए भी पीएम कार्य करते हैं। 


अमेरिका के कर्ज को लेकर चर्चा

संयुक्त राज्य अमेरिका पर जीडीपी के मुकाबले 200 प्रतिशत कर्जा है। लेकिन अमेरिका को इस कारण फर्क नहीं है क्योंकि कनाडा, अमेरिका के पास तेल, गैस के कुएं हैं। सोने की खान हैं। 200 प्रतिशत कर्जा होने के बावजूद वे अपने संसाधनों तेल, गैस, सोने का ज्यादा खनन नहीं करते हैं। अमेरिकी लोग अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए इसका संरक्षण करते हैं। वे कुछ ही दिनों के भीतर सोना, तेल आदि को बेचकर कर्जा उतार सकते हैं लेकिन वे अपनी चलित मुद्रा के सहारे ही निर्णय लेते हैं। 

अब भारत के खनन क्षेत्र को देखें तो सामने आता है कि अडाणी समूह ने झारखण्ड में बिजली निर्माण का प्लांट लगाया हुआ है। यहां से बांग्लादेश को बिजली सप्लाई की जाती है। झारखण्ड को इसलिए केन्द्र बनाया गया क्योंकि वह आदिवासी बहुल राज्य है। वहां पर तापघर बनाने के लिए आदिवासियों की जमीनों पर कब्जे हुए और इसी कारण आदिवासियों ने विरोध स्वरूप भाजपा को वोटिंग नहीं की। 

इन कोयले की खदानों से कितना कोयला, अडाणी, टाटा-बिरला आदि खनन कर रहे हैं किसी को  नहीं पता। अधिकारियों की भी हिम्मत नहीं है कि वे जांच कर सकें। गोवा के जंगलों का क्या हो रहा है, यह भी जानकारी मैनस्ट्रीम के माध्यम से बाहर नहीं आ पा रही है। 

देश की जनता को इन समाचारों से दूर अन्य समाचारों के माध्यम से बिजी रखा जा रहा है। 






<< Home

This page is powered by Blogger. Isn't yours?

Subscribe to Comments [Atom]