Sunday, October 5, 2025
क्या युवा नया विश्व निर्माण को तैयार है?
श्रीगंगानगर। दुनिया में भारी परिवर्तन हो रहा है। राजनेताओं के आश्वासनों से बेरोजगारी, गरीबी, शिक्षा का स्तर ऊंचा नहीं उठ पाया है और जेन-जैड नाम से युवा अब नेताओं से सत्ता की चाबी छीन रहे हैं। बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका ही नहीं पूरे विश्व में अनेक देश ऐसे हैं जो युवाओं के प्रदर्शन का सामना कर रहे हैं।
उत्तरी अफ्रीकी देश मौरक्को में इस समय युवा आंदोलन कर रहे हैं। युवाओं के इस आंदोलन के कारण सत्ता पर राजनेताओं की पकड़ ढीली हो रही है। कारण वही है जो दक्षिण एशियाई देशों के पास था। लोकतंत्र के नाम पर सत्ता की चाबी के सहारे युवाओं को बेरोजगार रखना। उन्हें मजबूत नहीं मजबूर जीवन जीने के लिए कुत्साहित करना।
विश्व किस दिशा में जा रहा है
सबसे पहले यह देखना होगा कि विश्व किस दिशा में जा रहा है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, हर दिन युद्ध की आशंका बलवत होती जा रही है। वल्र्ड वॉर-3 के लिए देश तैयार हो रहे हैं और अपने रक्षा खर्च को बढ़ाते जा रहे हैं।
पाकिस्तान को भारत के रक्षा और सेना अध्यक्ष ने चेतावनी दी थी और दूसरे ही दिन पाकिस्तान की तरफ से जवाब आ गया। इस तरह से दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक रवैया अपनाये हुए हैं।
भारत साफ कह रहा है कि सिंदूर-2 समाप्त नहीं हुआ है। हालांकि विश्व युद्ध-3 को रोकने के लिए व्यापारिक बैठकों का दौर आरंभ किया गया है। एक-दूसरे के साथ सहयोग बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। लेकिन हथियारों की खरीद पर कोई देश रोक नहीं लगाना चाहता।
अभी हाल ही में पीएम ब्रिटेन की यात्रा करके लौटे हैं। प्रधानमंत्री के रूप में उनका दूसरा दौरा था। अब यूके के पीएम कीर स्टार्मर दिल्ली की यात्रा करने वाले हैं। छ: माह के भीतर यूएसए के राष्ट्रपति लंदन की दो बार यात्रा कर चुके हैं। एशियाई देशों में जापान, दक्षिण कोरिया और कई अन्य देश के राष्ट्राध्यक्ष वाशिंगटन डीसी जाकर आये हैं और डील को भी फाइनल किया है। अब राष्ट्रपति ट्रम्प एशिया के दौरे पर आ रहे हैं। वे भारत नहीं आ रहे। न ही भारतीय पीएम आसियान देशों के सम्मेलन में शामिल होंगे।
गाजा पर समझौता हो सकता है!
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 21 सूत्रीय समझौता प्रारूप तैयार कर इजरायल और अरब के देशों को भेजा था ताकि दो साल से चल रहे युद्ध को समाप्त करवाया जा सके। कुछ शर्तों पर प्रतिबंधित संगठन हमास सहमत हो गया है। हथियार निरस्त्रीकरण पर अभी सहमति नहीं बन पायी है।
अगर हमास ऐसा नहीं करता है तो क्या युद्ध जारी रहेगा? यह सवाल पूरी दुनिया के सामने है।
हमास के निरस्त्रीकरण के बिना शायद इजरायल इस समझौते पर सहमत नहीं हो कि वह सेना को वापिस बुला ले।
अनेक देशों में घरेलू अशांति
विश्व के अनेक ऐसे देश हैं जो घरेलू अशांति का भी सामना कर रहे हैं। फ्रांस के सामने बड़ा गंभीर मामला है। दो साल के भीतर पांच प्रधानमंत्री बदले जा चुके हैं और अभी तक बजट को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है।
वहां युवा बजट में कटौती को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। सरकार के समक्ष समस्या यह है कि वह ईयू की शर्तों के अनुसार सकल घरेलू उत्पाद का तीन प्रतिशत से अधिक घाटा नहीं होना चाहिये। वहीं फ्रांस पांच प्रतिशत घाटा बर्दाश्त कर रहा है।
इस कारण सरकार के समक्ष बजट को छोटा करना मजबूरी हो गया है तो दूसरी ओर युवा चाहते हैं कि उनकी सुविधाओं में कमी नहीं होनी चाहिये। इससे स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होंगी। एक विचार यह भी आया था कि बड़े अमीर लोगों पर अतिरिक्त टैक्स लगाया जाये, वहीं आशंका यह भी बन गयी कि यह अमीर व्यक्ति ईयू के दूसरे देशों में अपना व्यापार लगा सकते हैं।
जापान और कोरिया के समक्ष भी यही समस्या
दूसरी ओर जापान व दक्षिण कोरिया के भी राजनीतिक स्थिति मजबूत नहीं है। जापान में शिंजो आबे के बाद पांच सालों में चार प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। शिगेरू इशिबा ने हाल ही में इस्तीफा दिया है और उनके स्थान पर नये पीएम आ चुके हैं।
इसी तरह से दक्षिण कोरिया में कुछ माह के भीतर तीन राष्ट्राध्यक्ष बदल चुके हैं। एक राष्ट्रपति पर तो केस भी चलाया जा रहा है।
भारत के मणिपुर में शांति तो लद्दाख में आंदोलन
भारत के उत्तरी-पूर्वी राज्य मणिपुर में आंदोलन दो साल से भी अधिक समय तक चला और वहां पर शांति स्थापित हुई तो लद्दाख में एक जन आंदोलन आरंभ हो गया। सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया है।
वांगचुक को भारत की मौजूदा सरकार ने ही कई ईनाम और पद दिये थे और अब उन पर रासूका को लागू कर दिया गया। वांगचुक के नेतृत्व में 15 दिनों से आंदोलन और अनशन चल रहा था। मैनस्ट्रीम में यह समाचार सुनाई नहीं दिया और एक दिन भाजपा का कार्यालय जला दिया गया तो यह देश की प्रमुख खबर बन गयी और वांगचुक पर पाकिस्तान के साथ सांठगांठ के आरोप लगा दिये गये। जोधपुर जेल भेज दिया गया।
उन पर आरोप लगाया गया है कि पाकिस्तान के समाचार पत्र डॉन के कार्यक्रम में उन्होंने शिरकत की थी। अगर पाकिस्तान का समाचार पत्र किसी आतंकवादी संगठन की तरफ से संचालित होता है तो उस पर भारत सरकार को पूर्व में ही रोक लगा देनी चाहिये था। उसका डिजीटल संस्करण भारत में भी आसानी से उपलब्ध होता है।
वहीं भारत की मीडिया तो पाकिस्तान के कई दुर्दांत आतंकवादी के इंटरव्यू चला चुका है। पाकिस्तान के क्रिकेटर इमरान खान (प्रधानमंत्री बनने से पूर्व) तो कुछ चैनल्स के मुख्य कार्यक्रम में शामिल भी हुए हैं। इस तरह से पाक मीडिया के कार्यक्रम में शिरकत करना तो रासूका का कारण नहीं हो सकता और न ही भाजपा कार्यालय को आग लगाना राष्ट्रद्रोह है।
निजी सम्पत्ति को आग लगाना किसी भी तरह से यूएपीए के कानून में अंकित नहीं है। अपराध हुआ है तो वहां पर मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिये था और वांगचूक को अपने अधिवक्ता के माध्यम से मौका दिया जाना चाहिये था कि वे अपनी बात रखते।
यूक्रेन-रूस युद्ध का शायद अंत नहीं
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को रूस ने आमंत्रित किया था और जब वे वहां पर पहुंचे तो सुबह हो चुकी थी और उनके विश्राम के बाद उनको यह समाचार मिला कि रूस ने युक्रेन पर हमला कर दिया है। उन्होंने इस हमले को उचित ठहरा दिया।
वे देश पहुंचे तो उस दोरान तक सेना उनके खिलाफ हो चुकी थी और आखिर में उनको जेल में डाल दिया गया। अभी भी वे गिरफ्तार हैं और विशेष अदालत नैब में उनके खिलाफ मामला चल रहा है।
वे वर्षों बाद रूस जाने वाले पहले पाक पीएम थे और उन्होंने रूस का यह शानदार कदम बताया।
उस बात को तीन साल या इससे भी ज्यादा का समय हो गया है किंतु युक्रेन-रूस युद्ध समाप्त नहीं हुआ है। भारत के प्रधानमंत्री पर यह जिम्मेदारी डाली गयी थी कि वे रूस और युक्रेन की यात्रा कर युद्ध को समाप्त करवायें। पीएम ने यात्रा तो कर डाली किंतु युद्ध समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने युद्ध और बुद्ध को लेकर बयान जारी कर दिया।
रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन दिसंबर माह में नई दिल्ली की यात्रा करेंगे। इस दौरान नये रूसी विमान की खरीद को लेकर समझौता हो सकता है।
इससे पहले यह भी समाचार आ रहा है कि चीन-पाकिस्तान के संयुक्त उद्यम में निर्माणाधीन फाइटर जेट्स के लिए रूस करीबन 100 इंजन देगा।
इस तरह से भारत सरकार की कूटनीति के लिए यह बड़ा झटका हो सकता है।
भारत की विदेश नीति विफल क्यों हो रही है?
भारत सरकार की विदेश नीति इस समय आलोचनाओं का सामना कर रही है।
अगर भारत का इतिहास देखा जाये तो इंदिरा गांधी ने अपने समय मेें इंदिरा और इंडिया को एक समान रूप से पेश करने के लिए लोगों को अपने साथ जोड़ा था। प्राइवेट कंपनीज, बैंकों आदि का अधिग्रहण कर उसका सरकारीकरण किया गया। वे कहती थीं कि आई फॉर इंडिया और आई फॉर इंदिरा। वे एक-दूसरे का पूरक बनकर राजनीति करती थीं। उस समय इंदिरा गांधी की लोकप्रियता इतनी थी कि लोग उनके खिलाफ टिप्पणी को बर्दाश्त नहीं करते थे।
उनके निधन के बाद राजीव गांधी वह स्थिति को नहीं बनाये रख सके और भाजपा मजबूत दल के रूप में उभरकर सामने आ गया। अब पीएम नरेन्द्र मोदी भी वही नीति चाहते हैं। वे जनसभाओं में स्वयं का नाम लेना पसंद करते हैं और इस तरह की ब्रांडिंग तैयार की गयी है कि उनके विकल्प के बारे में लोग सोचना भी नहीं चाहते। अगर सोचना चाहते हैं तो मोदी के खिलाफ की गयी टिप्पणी को सोशल मीडिया पर इस तरह से प्रसारित किया जाता है कि टिप्पणीकर्ता ने राष्ट्रद्रोह कर दिया है। इस तरह से ट्रोल किया जाता है।
वही नरेन्द्र मोदी इस समय दुनिया के सामने अपने कमजोर विदेश नीति के कारण आलोचनाओं का भी सामना कर रहे हैं।
सरकार कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। हाल ही में एच 1 बी वीजा को लेकर अमेरिका प्रशासन ने बदलाव किया तो इसके लिए भी व्यक्ति विशेष को टारगेट किया जाने लगा।
ट्रम्प सरकार कई तरह के प्रतिबंध लगा चुकी है। अमेरिका का बॉयकाट नहीं किया जा सकता क्योंकि यूएसए के साथ अब भारत की रोटी-बेटी का रिश्ता बन चुका है।
आज जो आधुनिक तकनीक भारत के पास पहुंच रही है तो वह अमेरिका की देन है। कई सैन्य उपकरण भारत की फौज को दिये गये हैं।
भारतीय यूथ को इस समय भारत सरकार की नीतियों के कारण अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। लाखों भारतीय युवा हर साल उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाते थे और अब वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। अमेरिका में करीबन 40 प्रतिशत डॉक्टर्स भारतीय हैं। 70 प्रतिशत आईटी इंजीनियर्स भारतीय हैं।
भारत में नौकरियां नहीं। स्वरोजगार के लिए पैसे नहीं। स्र्टाटअप के लिए कोई आर्थिक सहायता नहीं। वृद्धावस्था के लिए कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं।
गरीब बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए सशक्त मील योजना नहीं। इस तरह से भारत दुनिया के टॉप देशों में होने के बावजूद कई तरह की समस्याओं से घिरा हुआ है।
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