Tuesday, October 21, 2025

 

मोदी सरकार ‘गेहूं’ को वायदा कारोबार में शामिल क्यों नहीं करती?



श्रीगंगानगर। अगर हम भारत देश का प्राचीन इतिहास देखें तो सामने आता है, ऋषि गौतम ने हजारों साल पहले या उससे भी कहीं ज्यादा, अपनी पत्नी को श्राप दिया था और उसका निवारण करने के लिए त्रेता युग को पहले ले आये और द्वापर युग को बाद में लेकर आये। इस तरह से भगवान श्रीराम चंद्र जी का जन्म पहले हुआ। 

इसका अर्थ है कि ऋषि गौतम ने युग को ही बदल दिया था। इस तरह से इतिहास के पन्नों पर उनका जिक्र होता है। अगर हम कलयुग की चर्चा करें तो सामने आयेगा, 90 का दशक, जब समाजवाद से आर्थिक दौर में सनातन धर्म प्रवेश कर गया। 

नरसिंह राव के प्रधानमंत्री रहते हुए डॉ. मनमोहनसिंह ने वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाला और ट्रेड पेपर्स ने इसको उदारवाद का नाम दिया। इस तरह से हम उदारवाद में शामिल हो गये। 

हमें पता ही नहीं चला कि कब हमारे परिवार में मौसी, मामा, चाचा-ताया आदि का रिश्ता खत्म होने लगा। 

डॉ. सिंह ने जिंस और मैटल्स पर सट्टाबाजी का सरकारीकरण कर दिया। इस तरह से भारतीय जिंसों को वायदा कारोबार में शामिल कर लिया गया और सोना-चांदी आदि धातु भी सट्टेबाजी के अंग बन गये। 

गेहूं आदि जिंसों खाद्यान्न जिंसों को शामिल नहीं किया गया, अन्यथा गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की थाली से रोटी-सब्जी भी गायब हो जाती। 

अब हम सवाल करें कि गेहूं और चावल को इसमें शामिल क्यों नहीं किया गया, क्योंकि इससे सट्टेबाज इसके दामों को ऊंचे आसमान तक ले जा सकते थे। 

अब चर्चा सोना-चांदी की जाये तो क्या सामने आता है? सामने आता है, सोना का तोला भाव अर्थात 10 ग्राम के दाम 1 लाख 30 हजार रुपये से भी ज्यादा हो गये हैं। 

सटोरिये क्रूड ऑयल, सोना-चांदी के दामों को प्रभावित कर रहे हैं। 2014 को विश्व गुरु बनने का उपदेश देने वाले नरेन्द्र मोदी की सरकार के समय सोने का भाव 30 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम था। बड़े सटोरिये सरकार के नजदीक पहुंच गये और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सिंडीकेट बना, जिसने सोने के भाव को 10 सालों के भीतर एक लाख रुपये तक बढ़ा दिया। पिछले साल की चर्चा की जाये तो यह 70 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम बढ़ गया है। 

विश्वस्तर पर बड़े खिलाड़ी जो विभिन्न गणराज्यों में सरकार के नजदीकी थे, सभी इस पर सहमत थे और सोने का भाव बढ़ता चला गया और आज हालात यह है कि सोना मध्यवर्गीय परिवारों की पहुंच से दूर हो गया है। 

भारतीय संस्कृति में सोना को महिलाओं के शृंगार के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इस तरह से महिलाओं का शृंगार ही छीन लिया गया। ब्याह-शादी में भी सोने के उपहार बहू और दामाद को दिये जाते हैं, अब इस परंपरा को खत्म कर दिया गया और वह भी तब जब सनातन धर्म का झंडा लेकर चलने वाले सत्ता पर काबिज हैं। 

सोने की खानों में अभी सोना खत्म नहीं हुआ है। अनेक हवाई अड्डे और बंदरगाह प्राइवेट हो गये हैं, इस तरह से सोने की तस्करी भी होती है और सरकार के नजदीकी लोग इसको अंजाम दे रहे हैं। 

अब यह समझ आ जाना चाहिये कि सिंडीकेट ने किस तरह से सोने के भावों को प्रभावित किया। टैक्स फ्री के रूप में देखे जाने वाले कुछ देश सिंडीकेट के पनाहगाह बने हुए हैं और वहां की जनता चाहे आर्थिक रूप से कमजोर हो। 

अब अगर रूस को देखें तो उसके पास खनिजों का सबसे विशाल भंडार है और वहां क्या हो रहा है। रूबल भारतीय रुपया से भी कमजोर है। तकनीक के क्षेत्र में यह देश दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। रूस के पास भारी-भरकम सोने के भंडार हैं। वहां से सोने को दुनिया के अन्य देशों में भेजा जाता है। 


मंदी क्यों रही दीपावली?

आर्थिक रूप से देखा जाये तो इस बार दीपावली बाजार में वह रौनक नहीं ला सकी, जो पिछले कई सालों से देखने को मिलती थी। असल में भारत गणराज्य की सरकार ने खेल ही ऐसा खेला कि किसी को समझ ही नहीं आया, करना क्या है। लोग तो लाइन में ही लगे रहे। 

दीपावली उत्सव सर्दियों की शुरुआत में आता है। उसी समय प्राचीन काल से किसान अपनी फसल भी लेकर आते हैं और इस तरह से किसानों के पास खरीददारी के लिए पर्याप्त पैसा आ जाता है। वहीं केन्द्र और राज्य सरकारें अपने कर्मचारियों को बोनस भी देती हैं और बड़ी कंपनियां भी अपने कर्मचारियों को दीपावली उत्सव के लिए अतिरिक्त धन देती हैं। इस तरह से खरीददारी का माहौल बन जाता है और रुपया एक से दूसरे हाथ पहुंचता है और इस तरह से जीडीपी बढ़ती है। 

अब भारत सरकार के नुमाइंदों ने पहले नोटबंदी लेकर आये और फिर जीएसटी का आगमन हुआ। नोट बंदी के कारण घर में सेविंग पैसा बाजार में आ गया और बैंकों के माध्यम से सरकार तक पहुंच गया। जीएसटी के माध्यम से बड़े टैक्स भी वसूले गये। 

अब सरकार ने खुद माना है कि जीएसटी-2 के जरिये वे टैक्स को कम कर रही हैं और पिछले अनेक सालों तक वह टैक्स के जरिये खुली कमाई का भंडारण अपने पास कर रही थी। 

लोगों से ज्यादा टैक्स वसूला गया और ज्यादा पैसा सरकार तक पहुंचा। जिससे मित्रों तक आसानी से लाखों-करोड़ रुपये पहुंच गये। बाजार में पैसा गायब होने लगा और मीडिल क्लास बैंकों के सहारे हो  गयी। सम्पत्तियां गिरवी रखी जाने लगी। दूसरी ओर मित्रों को तीन-चार ट्रिलियन रुपये दिये गये। यह खिलाड़ी एक-दो नहीं बल्कि दर्जन भर थे। इस तरह से जनता के पैसे की खुली लूट हुई। मुकेश अम्बानी के छोटे भाई अनिल के बारे में सीबीआई ने रिपोर्ट दर्ज कर यह खुलासा किया कि उन्होंने हजारों करोड़ रुपये बैंकर्स के साथ मिलकर लिये और उसका व्यवसाय चलाने के बजाय अन्य खातों में ट्रांसफर कर धोखाधड़ी की गयी। 

टोल टैक्स के जरिये भी हर माह कई हजार करोड़ रुपये वसूल किये जाते और सरकार के नजदीकी लोगों को यह ठेका दिया जाता और वसूली के लिए कर्मचारी रख दिये गये। इस तरह से 10 सालों में अनेक बैंक और वित्तीय एजेंसियों को लाइसेंस दिये गये। यह सब धन कुछ लोगों का था और जनता के पैसों को जनता को ही उधार दिया गया और मोटी रकम वसूल की गयी। 

अब बिहार चुनाव से पहले सरकार को लगा कि बाजार में पैसे नहीं है और लिक्विड मनी की कमजोरी से दीपावली फिकी रहेगी तो सरकार ने महिलाओं को 10-10 हजार रुपये ट्रांसफर करने का कार्य किया। 

वोट की खातिर सरकार क्या कर सकती थी और उसने यह दिखाया भी। 






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