Thursday, August 7, 2025

 

बैकफुट पर खेल रहे मोदी अब ला सकते हैं इमोशनल ड्रामा!

 


श्रीगंगानगर। स्वदेशी सामान का नारा देकर ‘मेक इन इंडिया’ के सहारे दो बार लोकसभा चुनाव जीत चुके नरेन्द्र मोदी अब इमोशनल ड्रामा खेलकर अपनी सीट बचाने की कोशिश में लगे हैं। आरएसएस का दबाव है। अमेरिका अपना प्रभाव दिखा रहा है। नाटो चेतावनी दे रहा है और कैबिनेट सदस्य मुखर हो रहे हैं। 

चीन के साथ कुछ ही माह हुए हैं जब भारतीय सैनिकों को शहादत देनी पड़ी थी और भारत के भीतर आरएसएस-मोदी सरकार ने चीनी सामानों का बहिष्कार का एलान कर दिया था। कई मोबाइल एप्लीकेशन को प्रतिबंधित कर दिया गया। मेक इन इंडिया का नारा दिया गया। स्वदेशी जागरण मंच ने चीन के विक्रय स्थानों पर दुकानों को बंद करवाने की चेष्टा की। 

अब वही चीन नरेन्द्र मोदी को प्यारा लग रहा है और वे 31 अगस्त को ड्रैगन के साथ शिखर बैठक करने वाले हैं। चीन निर्मित वस्तुओं ने भारत के व्यापारिक साम्राज्य को प्रभावित किया और वहीं वे जा रहे हैं। एक तरफ उनका भाषण होता है कि भारत के मेहनत और पसीने से बने उत्पाद ही खरीदे और बेचे जायेंगे। 

वे हाल ही में ब्रिटेन को खुश करके आये हैं। उनके लग्जरी उत्पाद और शराब आदि को शुल्क मुक्त कर दिया गया, लेकिन ब्रिटेन ने इसके बाद भी भारत को दमनकारी देशों की सूची में डाल दिया। इससे पश्चिम बाजार में पकड़ बनाने की उनकी कोशिश विफल हो गयी। 

प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी बैकफुट पर हैं और उनको एक भी ऐसी गेंद नहीं मिल रही जिस पर वे फ्रंटफुट पर आकर खेल सकें। 

अब उनके पास इमोशनल ड्रामा है और चीन-जापान यात्रा है। बिहार विधानसभा चुनावों के लिए वे प्रचार कर रहे हैं और कह रहे हैं कि उनको व्यक्तिगत नुकसान होगा लेकिन वे अमेरिका के कृषि और डेयरी उत्पाद भारत में नहीं आने देंगे। 

जापान के माध्यम से वे एक बार पुन: अमेरिका को मनाने की कोशिश कर सकते हैं। उनकी यात्रा से पूर्व ही अमेरिका ने टैरिफ को 50 प्रतिशत ले जाने की जानकारी सार्वजनिक कर दी है। 

इससे गुजरात में टैक्सटाइल, सोने की ज्वैलरी का कारोबार बुरी तरह से प्रभावित होगा। क्योंकि इन उत्पादों पर ही 25 प्रतिशत टैक्स लगाया गया है। अमेरिका दुनिया में भारत के सामानों का सबसे बड़ा आयातक ही नहीं बल्कि लाखों या इससे ज्यादा करोड़ों लोगों को रोजगार भी दिया हुआ है। 

अमेरिका का आईटी सैक्टर आउट सोर्सिंग या अन्य माध्यम से भारत के प्रोफशनल आईटी इंजीनियर से कार्य करवा रहा है। लाखों आईटी सैक्टर के इंजीनियर एच 1 बी वीजा पर अमेरिका में रह रहे हैं और उनको ग्रीन कार्ड मिला हुआ है। 

डोनाल्ड ट्रम्प इस समय नरेन्द्र मोदी के साथ व्यक्तिगत रूप से रूष्ट हैं। उन्होंने मौखिक चेतावनी दी है कि आईटी कंपनियां भारतीयों से कार्य नहीं करवायें। कंपनियां दबाव में हैं। एप्पल को लीजिये डोनाल्ड ट्रम्प के साथ पांच लाख करोड़ रुपये का निवेश करने का समझौता किया है। इससे इंडिया से अमेरिका मोबाइल बेचने की जो योजना बनायी गयी थी, उसका अंत हो गया है। एप्पल अब खुद अमेरिका में ही प्लांट स्थापित कर वहां अतिरिक्त निर्माण का रास्ता खोलेगा। 

अगर ट्रम्प इंडियन प्रोफेशनल का एच 1 बी वीजा समाप्त कर दें तो लाखों बेरोजगार पेशेवरों को इंडिया संभाल सकेगा। इतने लोगों को अन्य विकसित देश वीजा देने की स्थिति में नहीं होगा। 


इमोशनल ड्रामा क्यों कर रहे हैं?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने कार्यकाल के सबसे बुरे दिनों से गुजरना पड़ रहा है। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा लिया तो इसके बाद राष्ट्रपति के इस्तीफे की चर्चा भी दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में हो रही है। 

भारत के सरकारी बंदरगाहों को संभालने वाले नरेन्द्र मोदी के सबसे नजदीकी गौतम अडाणी को भी अडाणी पोर्ट कंपनी से इस्तीफा देना पड़ा है। अगले कुछ दिनों के भीतर उनसे एयरपोर्ट संभालने का ठेका वापिस ले लिया गया तो क्या होगा? उस समय उनके पास अडाणी गु्रप को छोडऩे के अलावा कोई रास्ता नहीं होगा। 

एयरपोर्ट और बंदरगाह तो अब अडाणी को मुक्त करने ही होंगे। 


अमेरिका पर सवाल क्यों उठाया जा रहा है?

भारत की अर्थव्यवस्था और अराजकता देश के 140 करोड़ लोग देख रहे हैं। कैबिनेट सदस्य नीतिन गडक़री ने साफ कहा है कि लोगों को जागरुक होना होगा और सरकार से सवाल करने के लिए अदालतों में जाना चाहिये। 

क्या अमेरिका की अर्थव्यवस्था कृषि क्षेत्र पर आधारित है? दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां संयुक्त राज्य में है और अनेक कंपनियों के सीइओ ट्रिलियन डॉलर वाली इकाइयों को संभाल रहे हैं। एप्पल भी उसमें शामिल है। 

डोनाल्ड ट्रम्प सिर्फ कृषि व्यापार को बढ़ावा देने के लिए नहीं बल्कि वे बार-बार झूठा वादा या झांसा देने के कारण रूष्ट हैं। ट्रम्प के 1.0 कार्यकाल में मोदी और गुजराती एसोसिएट ने अमेरिका से भारी-भरकम पेट्रोलियम पदार्थ सस्ते दामों पर खरीदा था और अनेक देशों को महंगे दामों पर बेचा था, जिस तरह से रूस से लेकर यूरोप को बेचा गया। इतनी मदद करने के बाद भी अमेरिका से मित्रतापूर्ण व्यवहार नहीं किया गया। 

अमेरिकी कारों पर भारी भरकम टैक्स लगाया जाता है, इससे किसानों का कोई वास्ता नहीं है। 

ट्रम्प के एक वार से गुजरात में हलचल मची हुई है और जो राज्य पिछले 24 सालों या इससे भी अधिक समय से मोदी की पकड़ में था, वह अब हाथ से निकलता हुआ नजर आ रहा है। 

चुनावों के समय अनेक बार मोदी रोये हैं। दुनिया को आंसू दिखाये हैं और अब दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि वे किसानों के हितों की रक्षा करना चाहते हुए शहीद (कुर्सी का त्याग करने वाले हैं) का दर्जा हासिल करने को भी तैयार हैं। 

भारत में भी भारतीय जनता पार्टी में अनेक नेता हैं जो धीरे-धीरे विरोध में सामने आ रहे हैं। 10 साल तक इस तरह की स्थिति नहीं आयी थी। 






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